साष्टांग दण्डवत प्रणाम…..!

vidyarthi vikas sansthan
साष्टांग दण्डवत प्रणाम…..!

विदेश के बड़े-बड़े विद्वान एवं वैज्ञानिक भारत में प्रचलित गुरु समक्ष साधक के साष्टांग दण्डवत प्रणाम की प्रथा को पहले समझ न पाते थे कि भारत में ऎसी प्रथा क्यों है । अब बड़े-बड़े प्रयोगों के द्वारा उनकी समझ में आ रहा है कि यह सब युक्तियुक्त है । इस श्रद्धा-भाव से किये हुए प्रणाम आदि द्वारा ही शिष्य गुरु से लाभ ले सकता है, अन्यथा आध्यात्मिक उत्थान के मार्ग पर वह कोरा ही रह जाय ।

एक बल्गेरियन डॉ. लोजानोव ने ’इन्स्टीट्यूट आफ सजेस्टोलोजी ’ की स्थापना की है जिसे एक ’मंत्र महाविद्यालय’ कहा जा सकता है । वहाँ प्रयोग करनेवले लोरेन्जो आदि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस संस्था में हम विद्यार्थियों को २ वर्ष का कोर्स २० दिन में पूरा करा देते हैं । वैज्ञानिकों से भरी अंतर्राष्ट्रीय सभा में जब लोजानोव से पूछा गया कि यह युक्ति आपको कहाँ से मिली । तब उन्होंने कहा: “भारतीय योग में जो शवासन का प्रयोग है उसमें से मुझे इस पद्धति को विकसित करने की प्रेरणा मिली ।”

लोजानोव कहते हैं: “रात्रि में हमें विश्राम और शक्ति प्राप्त होती है क्योंकि हम उस समय चित सो जाते हैं । इस अवस्था में हमारे सभी प्रकार के शारीरिक-मानसिक तनाव (टेन्शन) कम हो जाते हैं । परिणामस्वरुप हममें फिर नयी शक्ति और स्फूर्ति ग्रहण करने की योग्यता आ जाती है । जब हम खड़े हो जाते हैं तब हमारे भीतर का अहंकार भी उठ खड़ा होता है और समस्त’टेन्शन’ शरीर पर फिर से लागू पड़ जाते हैं ।

निद्रा के समय की यह अवस्था शवासन में शरीर के शिथिलीकरण के समय उत्पन्न हो जाती है । साष्टांग दण्डवत प्रणाम में भी शरीर इसी प्रकार तनावरहित शिथिल और समर्पण की स्थिति में आ जाता है ।

चेक यूनिवर्सिटी में एक अन्य वैज्ञानिक राबर्ट पावलिटा ने भी इसी प्रकार के प्रयोग किये हैं । वे किसी भी थके हुए व्यक्ति को एक स्वस्थ गाय के नीचे जमीन पर चित लिटा देते हैं और कहते हैं कि समस्त तनाव (टेन्शन) छोड़कर पड़े रहो और भावना करो कि आप पर स्वस्थ गाय की शक्ति की वर्षा हो रही है । कुछ ही मिनटों में थकान और स्फूर्ति का मापक यंत्र बताने लगता है कि इस व्यक्ति की थकान उतर चुकी है और वह पहले से भी अधिक ताजा हो गया है । लोगों ने पावलिटा से पूछा : “यदि हम गाय के नीचे सोयें नहीं और केवल बैठे रहें तो ?” पावलिटाकहते हैं कि जो काम क्षणों में होता है वह काम बैठने से घण्टों में भी होना कठिन है ।

सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों ने भी अनुभव से जाना कि रोगी सामने बैठकर इतना लाभान्वित नहीं होता, जितना उसके सामने चित लेटकर, तनावरहित अवस्था में शिथिल होकर लाभान्वित होता है । उस अवस्था में वह अपने अंदर छुपी हुई ऎसी बातें भी कह देता है, गुप्तरुप से किये अपराध को भी अपने आप स्वीकार लेता है जिन्हें वह बैठकर कभी नहीं कहता अथवा स्वीकारता । चितलेटने से उसके अंदर समर्पण का एक भाव अपने आप पैदा होता है ।

आज कल स्कूल-कॉलेज के बड़े-बड़े शिक्षाशास्त्रियों की शिकायत है कि शिक्षकों के प्रति विद्यार्थियों का श्रद्धाभाव बिल्कुल घट गया है । अतएव देश में अनुशासनहीनता तेजी से बढ़ रही है । इसका एक कारण  यह भी है कि हम ऋषियों द्वारा निर्दिष्ट दण्डवत प्रणाम की प्रथा को विदेशी अन्धानुकरण के जोश में ठोकर मारने लगे हैं ।

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साष्टांग दण्डवत प्रणाम…..!
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