आदर्श विद्यार्थी की पहचान

 

vidyarthi vikas sansthan
आदर्श विद्यार्थी की पहचान

बच्चा सहज, सरल, निर्दोष और भगवान का प्यारा होता है। बच्चों में महान होने के कितने ही गुण बचपन में ही नज़र आते हैं। जिससे बच्चे को आदर्श बालक कहा जा सकता है। ये गुण निम्नलिखित हैं-

  1. वह शांत स्वभाव होता हैः जब सारी बातें उसके प्रतिकूल हो जाती हैं या सभी निर्णय उसके विपक्ष में हो जाते हैं, तब भी वह क्रोधित नहीं होता।

  1. वह उत्साही होता हैः जो कुछ वह करता है, उसे अपनी योग्यता के अनुसार उत्तम से उत्तम रूप में करता है। असफलता का भय उसे नहीं सताता।

  1. वह सत्यनिष्ठ होता हैः सत्य बोलने में वह कभी भय नहीं करता। उदारतावश कटु व अप्रिय सत्य भी नहीं कहता।

  1. वह धैर्यशील होता हैः वह अपने सतकर्म में दृढ़ रहता है। अपने सतकर्मों का फल देखने के लिए भले उसे लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़े, फिर भी वह धैर्य नहीं छोड़ता, निरूत्साहित नहीं होता है। अपने कर्म में डटा रहता है।

  1. वह सहनशील होता हैः सहन करे वह संत इस कहावत के अनुसार वह सभी दुःखों को सहन करता है। परंतु कभी इस विषय में शिकायत नहीं करता है।

  1. वह अध्यवसायी होता हैः वह अपने कार्य में कभी लापरवाही नहीं करता। इस कारण उसको वह कार्य भले ही लम्बे समय तक जारी रखना पड़े तो भी वह पीछे नहीं हटता।

  1. वह समचित्त होता हैः वह सफलता और विफलता दोनों अवस्थाओं में समता बनाये रखता है।

  1. वह साहसी होता हैः सन्मार्ग पर चलने में, लोक-कल्याण के कार्य करने में, धर्म का अनुसरण व पालन करने में, माता-पिता व गुरूजनों की सेवा करने व आज्ञा मानने में कितनी भी विघ्न-बाधाएँ क्यों न आयें, वह जरा-सा भी हताश नहीं होता, वरन् दृढ़ता व साहस से आगे बढ़ता है।

  1. वह आनन्दी होता हैः वह अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रसन्न रहता है।

  1. वह विनयी होता हैः वह अपनी शारीरिक-मानसिक श्रेष्ठता एवं किसी प्रकार की उत्कृष्ट सफलता पर कभी गर्व नहीं करता और न दूसरों को अपने से हीन या तुच्छ समझता है।विद्या ददाति विनयम्।

  1. वह स्वाध्यायी होता हैः वह संयम, सेवा, सदाचार व ज्ञान प्रदान करने वाले उत्कृष्ट सदग्रन्थों तथा अपनी कक्षा के पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन करने में ही रूचि रखता है और उसी में अपना उचित समय लगाता है, न कि व्यर्थ की पुस्तकों में जो कि उसे इन सदगुणों से हीन करने वाले हों।

  1. वह उदार होता हैः वह दूसरों के गुणों की प्रशंसा करता है, दूसरों को सफलता प्राप्त करने में यथाशक्ति सहायता देने के लिए बराबर तत्पर रहता है तथा उनकी सफलता में खुशियाँ मनाता है। वह दूसरों की कमियों को नज़रंदाज करता है।

  1. वह गुणग्राही होता हैः वह मधुमक्खी की तरह मधुसंचय की वृत्तिवाला होता है। जैसे मधुमक्खी विभिन्न प्रकार के फूलों के रस को लेकर अमृततुल्य शहद का निर्माण करती है, वैसे ही आदर्श बालक श्रेष्ठ पुरुषों, श्रेष्ठ ग्रन्थों व अच्छे मित्रों से उनके अच्छे गुणों को चुरा लेता है और उनके दोषों को छोड़ देता है।

  1. वह ईमानदार और आज्ञाकारी होता हैः वह जानता है कि ईमानदारी ही सर्वोत्तम नीति है। माता-पिता और गुरू के स्व-परकल्याणकारी उपदेशों को वह मानता है। वह जानता है कि बड़ों के आज्ञापालन से आशीर्वाद मिलता है और आशीर्वाद से जीवन में बल मिलता है। ध्यान रहेः दूसरों के आशीर्वाद व शुभकामनाएँ सदैव हमारे साथ रहते हैं।

  1. वह एक सच्चा मित्र होता हैः वह विश्वसनीय, स्वार्थरहित प्रेम देनेवाला, अपने मित्रों को सही रास्ता दिखाने वाला तथा मुश्किलों में मित्रों का पूरा साथ देने वाला मित्र होता है।

 

 

वैलेंटाइन डे के सही अर्थ को न ले के आज……?

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वैलेंटाइन डे के सही अर्थ को न ले के आज

 यूरोप (और अमेरिका) का समाज जो है वो रखैलों (Kept) में विश्वास करता है पत्नियों में नहीं, यूरोप और अमेरिका में आपको शायद ही ऐसा कोई पुरुष या मिहला मिले जिसकी एक शादी हुई हो, जिनका एक पुरुष से या एक स्त्री से सम्बन्ध रहा हो और ये एक दो नहीं हजारों साल की परम्परा है उनके यहाँ। आपने एक शब्द सुना होगा “Live in Relationship” ये शब्द आजकल हमारे देश में भी नव-अभिजात्य वर्ग में चल रहा है, इसका मतलब होता है कि “बिना शादी के पती-पत्नी की तरह से रहना” तो उनके यहाँ, मतलब यूरोप और अमेरिका में ये परंपरा आज भी चलती है। खुद प्लेटो (एक यूरोपीय दार्शनिक) का एक स्त्री से सम्बन्ध नहीं रहा, प्लेटो ने लिखा है कि “मेरा 20-22 स्त्रीयों से सम्बन्ध रहा है”। अरस्तु भी यही कहता है, देकातेर् भी यही कहता है, और रूसो ने तो अपनी आत्मकथा में लिखा है कि “एक स्त्री के साथ रहना, ये तो कभी संभव ही नहीं हो सकता, It’s Highly Impossible” तो वहां एक पत्नी जैसा कुछ होता नहीं और इन सभी महान दार्शनिकों का तो कहना है कि “स्त्री में तो आत्मा ही नहीं होती” “स्त्री तो मेज और कुर्सी के समान हैं, जब पुराने से मन भर गया तो पुराना हटा के नया ले आये” तो बीच-बीच में यूरोप में कुछ-कुछ ऐसे लोग निकले जिन्होंने इन बातों का विरोध किया और इन रहन-सहन की व्यवस्थाओं पर कड़ी टिप्पणी की। उन कुछ लोगों में से एक ऐसे ही यूरोपियन व्यक्ति थे जो आज से लगभग 1500 साल पहले पैदा हुए, उनका नाम था – वैलेंटाइन और ये कहानी है 478 AD (after death) की, यानि ईशा की मृत्यु के बाद।

उस वैलेंटाइन नाम के महापुरुष का कहना था कि “हम लोग (यूरोप के लोग) जो शारीरिक सम्बन्ध रखते हैं कुत्तों की तरह से, जानवरों की तरह से, ये अच्छा नहीं है, इससे सेक्स-जनित रोग (veneral disease) होते हैं, इनको सुधारो, एक पति-एक पत्नी के साथ रहो, विवाह कर के रहो, शारीरिक संबंधो को उसके बाद ही शुरू करो” ऐसी-ऐसी बातें वो करते थे और वो वैलेंटाइन महाशय उन सभी लोगों को ये सब सिखाते थे, बताते थे, जो उनके पास आते थे, रोज उनका भाषण यही चलता था रोम में घूम-घूम कर। संयोग से वो चर्च के पादरी हो गए तो चर्च में आने वाले हर व्यक्ति को यही बताते थे, तो लोग उनसे पूछते थे कि ये वायरस आप में कहाँ से घुस गया, ये तो हमारे यूरोप में कहीं नहीं है, तो वो कहते थे कि “आजकल मैं भारतीय सभ्यता और दर्शन का अध्ययन कर रहा हूँ, और मुझे लगता है कि वो परफेक्ट है, और इसिलए मैं चाहता हूँ कि आप लोग इसे मानो”, तो कुछ लोग उनकी बात को मानते थे, तो जो लोग उनकी बात को मानते थे, उनकी शादियाँ वो चर्च में कराते थे और एक-दो नहीं उन्होंने सैकड़ों शादियाँ करवाई थी।

जिस समय वैलेंटाइन हुए, उस समय रोम का राजा था क्लौडियस, क्लौडियस ने कहा कि “ये जो आदमी है-वैलेंटाइन, ये हमारे यूरोप की परंपरा को बिगाड़ रहा है, हम बिना शादी के रहने वाले लोग हैं, मौज-मजे में डूबे रहने वाले लोग हैं, और ये शादियाँ करवाता फ़िर रहा है, ये तो अपसंस्कृति फैला रहा है, हमारी संस्कृति को नष्ट कर रहा है”, तो क्लौड़ीयस ने आदेश दिया कि “जाओ वैलेंटाइन को पकड़ के लाओ “, तो उसके सैनिक वैलेंटाइन को पकड़ के ले आये। क्लौडियस ने वैलेंटाइन से कहा कि “ये तुम क्या गलत काम कर रहे हो ? तुम अधर्म फैला रहे हो, अपसंस्कृति ला रहे हो” तो वैलेंटाइन ने कहा कि “मुझे लगता है कि ये ठीक है”, क्लौडियस ने उसकी एक बात न सुनी और उसने वैलेंटाइन को फाँसी की सजा दे दी, आरोप क्या था कि वो बच्चों की शादियाँ कराते थे, मतलब शादी करना जुर्म था। क्लौडियस ने उन सभी बच्चों को बुलाया, जिनकी शादीवैलेंटाइन ने करवाई थी और उन सभी के सामने वैलेंटाइन को 14 फ़रवरी 498 ईशवी को फाँसी दे दी गयी।

पता नहीं आप में से कितने लोगों को मालूम है कि पूरे यूरोप में 1950 ईशवी तक खुले मैदान में, सावर्जानिक तौर पर फाँसी देने की परंपरा थी तो जिन बच्चों ने वैलेंटाइन के कहने पर शादी की थी वो बहुत दुखी हुए और उन सब ने उस वैलेंटाइन की दुखद याद में 14 फ़रवरी को वैलेंटाइन डे मनाना शुरू किया तो उस दिन से यूरोप में वैलेंटाइन डे मनाया जाता है। मतलब ये हुआ कि वैलेंटाइन, जो कि यूरोप में शादियाँ करवाते फ़िरते थे, चूंकि राजा ने उनको फाँसी की सजा दे दी, तो उनकी याद में वैलेंटाइन डे मनाया जाता है। ये था वैलेंटाइन डे का इतिहास और इसके पीछे का आधार।

अब यही वैलेंटाइन डे भारत आ गया है जहाँ शादी होना एकदम सामान्य बात है यहाँ तो कोई बिना शादी के घूमता हो तो अद्भुत या अचरज लगे लेकिन यूरोप में शादी होना ही सबसे असामान्य बात है। अब ये वैलेंटाइन ……?

 वैलेंटाइन डे हमारे स्कूलों में कॉलजों में आ गया है और बड़े धूम-धाम से मनाया जा रहा है और हमारे यहाँ के लड़के-लड़कियां बिना सोचे-समझे एक दुसरे को वैलेंटाइन डे का कार्ड दे रहे हैं और जो कार्ड होता है उसमे लिखा होता है ” Would You Be My Valentine” जिसका मतलब होता है “क्या आप मुझसे शादी करेंगे” मतलब तो किसी को मालूम होता नहीं है, वो समझते हैं कि जिससे हम प्यार करते हैं उन्हें ये कार्ड देना चाहिए तो वो इसी कार्ड को अपने मम्मी-पापा को भी दे देते हैं, दादा-दादी को भी दे देते हैं और एक दो नहीं दस-बीस लोगों को ये ही कार्ड वो दे देते हैं और इस धंधे में बड़ी-बड़ी कंपिनयाँ लग गयी हैं जिनको कार्ड बेचना है, जिनको गिफ्ट बेचना है, जिनको चाकलेट बेचनी हैं और टेलीविजन चैनल वालों ने इसका धुआधार प्रचार कर दिया। ये सब लिखने के पीछे का उद्देश्य यही है कि नक़ल आप करें तो उसमें अक्ल भी लगा लिया करें। उनके यहाँ साधारणतया शादियाँ नहीं होती है |

और जो शादी करते हैं वो वैलेंटाइन डे मनाते हैं लेकिन हम भारत में क्यों ??
वैलेंटाइन डे के सही अर्थ को न ले के आज समाज में अनैतिकता बढ़ रहा है जिसे हर हाल में रोकना होगा |
प्रेम में तो एक दुसरे का पोषण होता है शोषण नहीं सच्चा प्रेम तो माँ-बाप ही कर सकते है अपने संतान का |

भारतीय शिक्षा पद्धति मैकाले मा‍नसिकता वाली है

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 Indian Education Act बनाया गया आज हमारी शिक्षा व्यवस्था इसी कानून पर आधारित है यह मैकोले नाम के अँगरेज़ ने बनायीं थी हमें गुलाम बनाने के लिए और हमारी महान सभ्यता और संस्कृति को नस्ट करने के लिए…..मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो भारत कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से भारतीय लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे,मैकाले का भूत आज सबसे अधिक प्रसन्न होगा, यह देखकर कि 179 साल पहले की गयी उसकी भविष्यवाणी सही साबित हुई!

मैकोले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है “कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी” इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया, और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया उनमे आग लगा दी, उसमे पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला, सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे फ्री स्कूल कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं और हमारी शिक्षा व्यवस्था मकौले का वही Indian Education Act है………….अर्थात आज भी हमारे भारत में वही शिक्षा व्यवस्था चल रही है जो मैकोले ने हमें गुलाम बनने के लिए बनायीं थी और आज यही कारण है कि अपनी महान संस्कृति को हम स्वयं ही शिक्षा के नाम पर नस्ट करने में व्यस्त हैं…….और सच्चाई यही है कि हमारा अध्यात्म हमारी संस्कृति आज के विज्ञानं से अत्यधिक उच्च और सम्पन्न है आवश्यकता है तो उसे अपनाने की और मैकोले के षड़यंत्र को विफल करने की……!

यह तभी संभव है जब हम इस Indian educational act के षड़यंत्र को नस्ट कर पायें…………”गुरुकुल” के बारे में बहुत से लोगों को यह भ्रम है की वहाँ केवल संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी जो की गलत है यह Indian Education Act द्वारा फैलाया गया भ्रम है । 1820 में विलियम एडम नाम का एक अँगरेज़ आया था……उसने पुरे भारत का सर्वे कराया और ब्रिटिश संसद में 1117 पन्ने की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की उस रिपोर्ट के अनुसार भारत में गुरुकुल भारत की शक्ति और समृद्धि का मुख्य आधार है भारत में विज्ञान की 20 से अधिक शाखाएं रही है जो की बहुत पुष्पित पल्लवित रही है जिसमें प्रमुख १. खगोल शास्त्र २. नक्षत्र शास्त्र ३. बर्फ़ बनाने का विज्ञान ४. धातु शास्त्र ५. रसायन शास्त्र ६. स्थापत्य शास्त्र ७. वनस्पति विज्ञान ८. नौका शास्त्र ९. यंत्र विज्ञान १०. astrophysics ११.चिकित्सा विज्ञानं आदि इसके अतिरिक्त 20 अन्य विषयों कि भी शिक्षा समृद्ध रूप से गुरुकुलों में दी जाती हैं। संस्कृत भाषा मुख्यतः माध्यम के रूप में, उपनिषद एवं वेद छात्रों में उच्चचरित्र एवं संस्कार निर्माण हेतु पढ़ाए जाते हैं।(विलियम एडम के 1117 पन्ने की रिपोर्ट में भारत के विश्वविख्यात उच्चविज्ञान तकनीक को प्रमाणित करने वाले पर्याप्त उदहारण उपलब्ध हैं यहाँ सभी का वर्णन करना सभव नहीं) थोमस मुनरो सन 1813 के आसपास मद्रास प्रांत के राज्यपाल थे, उन्होंने अपने कार्य विवरण में लिखा है मद्रास प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण आंद्रप्रदेश, पूर्ण तमिलनाडु, पूर्ण केरल एवं कर्णाटक का कुछ भाग ) में 400 लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। उत्तर भारत (अर्थात आज का पूर्ण पाकिस्तान, पूर्ण पंजाब, पूर्ण हरियाणा, पूर्ण जम्मू कश्मीर, पूर्ण हिमाचल प्रदेश, पूर्ण उत्तर प्रदेश, पूर्ण उत्तराखंड) के सर्वेक्षण के आधार पर जी.डब्लू.लिटनेर ने सन1822 में लिखा है, उत्तर भारत में 200 लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है।

माना जाता है की मैक्स मूलर ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे अधिक शोध किया है, वे लिखते है “भारत के बंगाल प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण बिहार, आधा उड़ीसा, पूर्ण पश्चिम बंगाल, आसाम एवं उसके ऊपर के सात प्रदेश) में 80 हज़ार से अधिक गुरुकुल है जो कि कई सहस्त्र वर्षों से निर्बाधित रूप से चल रहे है”।
उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत के आकडों के कुल पर औसत निकलने से यह ज्ञात होता है की भारत में 18 वी शताब्दी तक 300 व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल था। एक और चौकानें वाला तथ्य यह है की 18वी शताब्दी में भारत की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ थी, 300 व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल के अनुसार भारत में 7लाख 32 हज़ार गुरुकुल होने चाहिए। अब रोचक बात यह भी है की अंग्रेज प्रत्येक दस वर्ष में भारत में भारत का सर्वेक्षण करवाते थे उसे के अनुसार 1822 के लगभग भारत में कुल गांवों की संख्या भी लगभग 7 लाख 32 हज़ार थी, अर्थात प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल(1834 में मेकॉले के सर्वेक्षण में ऐसे ही तथ्य सामने आते हैं) 16 से 17 वर्ष भारत में प्रवास करने वाले शिक्षाशास्त्री लुडलो ने भी 18वी शताब्दी में यहीं लिखा की “भारत में एक भी गाँव ऐसा नहीं जिसमें गुरुकुल नहीं एवं एक भी बालक ऐसा नहीं जो गुरुकुल जाता नहीं”।

राजा की सहायता के बिना, समाज से पोषित इन्ही गुरुकुलों के कारण 18वी शताब्दी तक भारत में साक्षरता 97%थी, बालक के 5 वर्ष, 5 माह, 5 दिवस के होते ही उसका गुरुकुल में प्रवेश हो जाता था। प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक विद्यार्जन का क्रम 14 वर्ष तक चलता था। जब बालक सभी वर्गों के बालको के साथ निशुल्कः 20 से अधिक विषयों का अध्ययन कर गुरुकुल से निकलता था, तब आत्मनिर्भर, देश एवं समाज सेवा हेतु सक्षम हो जाता था।इसके उपरांत विशेषज्ञता (पांडित्य) प्राप्त करने हेतु भारत में विभिन्न विषयों वाले जैसे शल्य चिकित्सा, आयुर्वेद, धातु कर्म आदि के विश्वविद्यालय थे, नालंदा एवं तक्षशिला तो 2000 वर्ष पूर्व के है परंतु मात्र 150 -170 वर्ष पूर्व भी भारत में 500-525 विश्वविद्यालय थे।

मैकोले 1834 के आस पास भारत आया था …….भारत कि आध्यात्मिक सांस्कृतिक सामाजिक व्यवस्था से वह अत्यंत प्रभावित था उसके सर्वे के रिपोर्ट भी उपलब्ध हैं और आश्चर्यजनक हैं छोटा सा अंश प्रस्तुत करूँगा 2 Feb 1835 में ब्रिटिश पार्ल्यामेंट में दिया गया उसका भाषण “I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a
beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this
country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and
cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and
English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation”……..थोमस बेबिगटन मैकोले (टी.बी.मैकोले) कई वर्षों भारत में यात्राएँ एवं सर्वेक्षण करने के उपरांत समझ गया की अंग्रेजो पहले के आक्रांताओ अर्थात यवनों, मुगलों आदि भारत के राजाओं, संपदाओं एवं धर्म का नाश करने की जो भूल की है, उससे पुण्यभूमि भारत को पराधीन बनाना असंभव है, अपितु संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश करे तो इन्हें पराधीन करने का स्वप्न पूर्ण हो सकता है। इसी कारण “इंडियन एज्यूकेशन एक्ट” बना कर समस्त गुरुकुल बंद करवाए गए। हमारे शासन एवं शिक्षा तंत्र को इसी लक्ष्य से निर्मित किया गया ताकि नकारात्मक विचार, हीनता की भावना, जो विदेशी है वह अच्छा, बिना तर्क किये रटने के बीज आदि बचपन से ही बाल मन में घर कर ले और अंग्रेजो को प्रतिव्यक्ति संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश का परिश्रम न करना पड़े।

मैकोले द्वारा British Parliament में दिए गए भाषण का प्रमाण हमारे वेद पुराण उपनिषद एवं सभी धार्मिक ग्रन्थ आज भी भारत के अध्यात्म और भारत की वैज्ञानिक श्रेष्ठता को दर्शाते हैं किन्तु हमें उन सब से दूर रखा गया है कारण क्या है हमारी वर्तमन शिक्षा व्यवस्था अर्थात मैकॉले का बनाया Indian educational act 1858 हमारी संस्कृति को ढोंग और पाखंड बताता है और दुर्भाग्य यह है की हमने मान भी लिया है मैकोले अपने षड़यंत्र में सफल हुआ है और हम सब कुछ जानते बुझते भ्रम में है पूर्ण रूप से आज भी उसके गुलाम……..
मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमे वो लिखता है कि “इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी और भारत शारीरिक रूप से आजाद होने पर भी मानसिक रूप से हमेशा हमारा गुलाम बना रहेगा” और आज मैकोले कि लिखी चिट्टी कि सच्चाई सामने दिख रही है हमारे भारत में……….अंत में पुन: मेकौले का वह कथन लिख रहा हूँ……

कुछ जीत ऐसी होती हैं जिन पर कभी आंच नहीं आती। यह ऐसा साम्राज्य है जिसे कोई समाप्त नहीं कर सकता। यह अविनाशी साम्राज्य अँग्रेजी भाषा, कला और कानून का है।”हमें अंग्रेज़ी साम्राज्य के विस्तार के लिए एक ऐसा वर्ग बनाना है जो अपनी जड़ों से घृणा करे। वे लोग रंग व रक्त से हिंदुस्तानी होंगे किन्तु आचार-व्यवहार में अंग्रेज़ होंगे।”
यही सच आज हमारे सामने है हम पूरी तरह काले अंग्रेज़ बनते जा रहे है !!
15 अगस्त 1947 से पूर्व हम गुलामी का विरोध करते थे आज हम गुलामी का सम्मान करते हैं……
प्रश्न केवल इतना है यह गुलामी कब तक रहेगी कब तक हम अपनी महान संस्कृति और सभ्यता का अपमान करते रहेंगे……….जो शिक्षा व्यवस्था हमें गुलाम बनाने के लिए बनायीं गयी है कब तक उसे अपनाकर हम गुलाम बने रहेंगे………..कब तक अपमान करते रहेंगे अपने शहीदों का….. उनके सपनों का …