वीर ! तुम बढ़े चलो….

vidyarthi vikas sansthan
वीर ! तुम बढ़े चलो….

मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं।

स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं।।

हौसला मत हार गिरकर ओ मुसाफिर !

ठोकरें इन्सान को चलना सिखाती हैं।।

लाल बहादुर शास्त्री एक गरीब विधवा माता के सुपुत्र थे। गरीबी के कारण उनकी माँ ने उन्हें पढ़ने के लिए अपने एक दूर के रिश्तेदार के यहाँ भेज दिया। लालबहादुर से वे लोग जूठे बर्तन मँजवाते, कपड़े धुलवाते तिस पर गालियाँ अलग से मिलतीं। लालबहादुर वास्तव में बहादुर निकले। शिला सम हृदय बनाकर उन्होंने अनेक बार अपमान तिरस्कार सहा पर डटे रहे और पढ़ लिख के एक दिन भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुँचे। उनकी ईमानदारी और कर्त्तव्यनिष्ठा को आज भी याद किया जाता है।

ईश्वरचन्द्र के सामने बड़ी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति थी। दिन भर तो वे कालेज में पढ़ते-पढ़ाते, वहाँ से आकर चार लोगों के लिए भोजन तैयार करते, सबको भोजन कराकर बर्तन माँजते और रात के दो बजे तक पढ़ते। अपने इस कठिन परिश्रम से वे व्याकरण, साहित्य, स्मृति, अलंकार आदि में पारंगत हो गये और धीरे-धीरे ʹविद्यासागरʹ के रूप में उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गयी। आज भी उन्हें उनकी उदारता व समाज सेवा के लिए याद किया जाता है।

ऐसे ही स्वामी रामतीर्थजी भी विद्यार्थी-अवस्था में बड़ी अभावग्रस्त दशा में रहे। कभी तेल न होता तो तो सड़क के किनारे के लैम्प के नीचे बैठकर पढ़ लेते। कभी धन के अभाव में एक वक्त ही भोजन कर पाते। फिर भी दृढ़ संकल्प और निरन्तर पुरुषार्थ से उन्होंने लौकिक विद्या ही नहीं पायी अपितु आत्मविद्या में भी आगे बढ़े और मानवीय विकास की चरम अवस्था आत्मसाक्षात्कार को उपलब्ध हुए। अमेरिका का प्रेसिडेंट रूजवेल्ट उनके दर्शन और सत्संग से धन्य-धन्य हो जाता था। कहाँ तो एक गरीब विद्यार्थी और कहाँ ૐकार के जप व प्रभुप्राप्ति के दृढ़ निश्चय से महान संत हो गये!

हे विद्यार्थी ! पुरुषार्थी बनो, संयमी बनो, उत्साही बनो। लौकिक विद्या तो पाओ ही पर उस विद्या को भी पा लो, जो मानव को जीते-जी मृत्यु के पार पहुँचा देती है। उसे भी जानो जिसको जानने से सब जाना जाता है, इसी में तो मानव-जीवन की सार्थकता है। हे वीर ! तुम बढ़े चलो….

सबसे श्रेष्ठ संपत्तिः चरित्र

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सबसे श्रेष्ठ संपत्तिः चरित्र

चरित्र मानव की श्रेष्ठ संपत्ति है, दुनिया की समस्त संपदाओं में महान संपदा है। पंचभूतों से निर्मित मानव-शरीर की मृत्यु के बाद, पंचमहाभूतों में विलीन होने के बाद भी जिसका अस्तित्व बना रहता है, वह है उसका चरित्र।

चरित्रवान व्यक्ति ही समाज, राष्ट्र व विश्वसमुदाय का सही नेतृत्व और मार्गदर्शन कर सकता है। आज जनता को दुनियावी सुख-भोग व सुविधाओं की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी चरित्र की। अपने सुविधाओं की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी की चरित्र की। अपने चरित्र व सत्कर्मों से ही मानव चिर आदरणीय और पूजनीय हो जाता है।

स्वामी शिवानंद कहा करते थेः

“मनुष्य जीवन का सारांश है चरित्र। मनुष्य का चरित्रमात्र ही सदा जीवित रहता है। चरित्र का अर्जन नहीं किया गया तो ज्ञान का अर्जन भी किया जा सकता। अतः निष्कलंक चरित्र का निर्माण करें।”

अपने अलौकिक चरित्र के कारण ही आद्य शंकराचार्य, महात्मा बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, पूज्य लीलाशाह जी बापू जैसे महापुरुष आज भी याद किये जाते हैं।

व्यक्तित्व का निर्माण चरित्र से ही होता है। बाह्य रूप से व्यक्ति कितना ही सुन्दर क्यों न हो, कितना ही निपुण गायक क्यों न हो, बड़े-से-बड़ा कवि या वैज्ञानिक क्यों न हो, पर यदि वह चरित्रवान न हुआ तो समाज में उसके लिए सम्मानित स्थान का सदा अभाव ही रहेगा। चरित्रहीन व्यक्ति आत्मसंतोष और आत्मसुख से वंचित रहता है। आत्मग्लानि व अशांति देर-सवेर चरित्रहीन व्यक्ति का पीछा करती ही है। चरित्रवान व्यक्ति के आस-पास आत्मसंतोष, आत्मशांति और सम्मान वैसे ही मंडराते हैं. जैसे कमल के इर्द-गिर्द भौंरे, मधु के इर्द-गिर्द मधुमक्खी व सरोवर के इर्द-गिर्द पानी के प्यासे।

चरित्र एक शक्तिशाली उपकरण है जो शांति, धैर्य, स्नेह, प्रेम, सरलता, नम्रता आदि दैवी गुणों को निखारता है। यह उस पुष्प की भाँति है जो अपना सौरभ सुदूर देशों तक फैलाता है। महान विचार तथा उज्जवल चरित्र वाले व्यक्ति का ओज चुंबक की भाँति प्रभावशाली होता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निमित्त बनाकर सम्पूर्ण मानव-समुदाय को उत्तम चरित्र-निर्माण के लिए श्रीमद् भगवद् गीता के सोलहवें अध्याय में दैवी गुणों का उपदेश किया है, जो मानवमात्र के लिए प्रेरणास्रोत हैं, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म अथवा संप्रदाय का हो। उन दैवी गुणों को प्रयत्नपूर्वक अपने आचरण में लाकर कोई भी व्यक्ति महान बन सकता है।

निष्कलंक चरित्र निर्माण के लिए नम्रता, अहिंसा, क्षमाशीलता, गुरुसेवा, शुचिता, आत्मसंयम, विषयों के प्रति अनासक्ति, निरहंकारिता, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि तथा दुःखों के प्रति अंतर्दृष्टि, निर्भयता, स्वच्छता, दानशीलता, स्वाध्याय, तपस्या, त्याग-परायणता, अलोलुपता, ईर्ष्या, अभिमान, कुटिलता व क्रोध का अभाव तथा शाँति और शौर्य जैसे गुण विकसित करने चाहिए।

कार्य करने पर एक प्रकार की आदत का भाव उदय होता है। आदत का बीज बोने से चरित्र का उदय और चरित्र का बीज बोने से भाग्य का उदय होता है। वर्तमान कर्मों से ही भाग्य बनता है, इसलिए सत्कर्म करने की आदत बना लें।

चित्त में विचार, अनुभव और कर्म से संस्कार मुद्रित होते हैं। व्यक्ति जो भी सोचता तथा कर्म करता है, वह सब यहाँ अमिट रूप से मुद्रित हो जाता है। व्यक्ति के मरणोपरांत भी ये संस्कार जीवित रहते हैं। इनके कारण ही मनुष्य संसार में बार-बार जन्मता-मरता रहता है।

दुश्चरित्र व्यक्ति सदा के लिए दुश्चरित्र हो गया – यह तर्क उचित नहीं है। अपने बुरे चरित्र व विचारों को बदलने की शक्ति प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान है। आम्रपाली वेश्या, मुगला डाकू, बिल्वमंगल, वेमना योगी, और भी कई नाम लिये जा सकते हैं। एक वेश्या के चँगुल में फँसे व्यक्ति बिल्वमंगल से संत सूरदास हो गये। पत्नी के प्रेम में दीवाने थे लेकिन पत्नी ने विवेक के दो शब्द सुनाये तो वे ही संत तुलसीदास हो गये। आम्रपाली वेश्या भगवान बुद्ध की परम भक्तिन बन कर सन्मार्ग पर चल पड़ी।

बिगड़ी जनम अनेक की सुधरे अब और आज।

यदि बुरे विचारों और बुरी भावनाओं का स्थान अच्छे विचारों और आदर्शों को दिया जाए तो मनुष्य सदगुणों के मार्ग में प्रगति कर सकता है। असत्यभाषी सत्यभाषी बन सकता है, दुष्चरित्र सच्चरित्र में परिवर्तित हो सकता है, डाकू एक नेक इन्सान ही नहीं ऋषि भी बन सकता है। व्यक्ति की आदतों, गुणों और आचारों की प्रतिपक्षी भावना (विरोधी गुणों की भावना) से बदला जा सकता है। सतत अभ्यास से अवश्य ही सफलता प्राप्त होती है। दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस से जो व्यक्ति उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ता है, सफलता तो उसके चरण चूमती है।

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सबसे श्रेष्ठ संपत्तिः चरित्र

आदर्श विद्यार्थी की पहचान

 

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आदर्श विद्यार्थी की पहचान

बच्चा सहज, सरल, निर्दोष और भगवान का प्यारा होता है। बच्चों में महान होने के कितने ही गुण बचपन में ही नज़र आते हैं। जिससे बच्चे को आदर्श बालक कहा जा सकता है। ये गुण निम्नलिखित हैं-

  1. वह शांत स्वभाव होता हैः जब सारी बातें उसके प्रतिकूल हो जाती हैं या सभी निर्णय उसके विपक्ष में हो जाते हैं, तब भी वह क्रोधित नहीं होता।

  1. वह उत्साही होता हैः जो कुछ वह करता है, उसे अपनी योग्यता के अनुसार उत्तम से उत्तम रूप में करता है। असफलता का भय उसे नहीं सताता।

  1. वह सत्यनिष्ठ होता हैः सत्य बोलने में वह कभी भय नहीं करता। उदारतावश कटु व अप्रिय सत्य भी नहीं कहता।

  1. वह धैर्यशील होता हैः वह अपने सतकर्म में दृढ़ रहता है। अपने सतकर्मों का फल देखने के लिए भले उसे लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़े, फिर भी वह धैर्य नहीं छोड़ता, निरूत्साहित नहीं होता है। अपने कर्म में डटा रहता है।

  1. वह सहनशील होता हैः सहन करे वह संत इस कहावत के अनुसार वह सभी दुःखों को सहन करता है। परंतु कभी इस विषय में शिकायत नहीं करता है।

  1. वह अध्यवसायी होता हैः वह अपने कार्य में कभी लापरवाही नहीं करता। इस कारण उसको वह कार्य भले ही लम्बे समय तक जारी रखना पड़े तो भी वह पीछे नहीं हटता।

  1. वह समचित्त होता हैः वह सफलता और विफलता दोनों अवस्थाओं में समता बनाये रखता है।

  1. वह साहसी होता हैः सन्मार्ग पर चलने में, लोक-कल्याण के कार्य करने में, धर्म का अनुसरण व पालन करने में, माता-पिता व गुरूजनों की सेवा करने व आज्ञा मानने में कितनी भी विघ्न-बाधाएँ क्यों न आयें, वह जरा-सा भी हताश नहीं होता, वरन् दृढ़ता व साहस से आगे बढ़ता है।

  1. वह आनन्दी होता हैः वह अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रसन्न रहता है।

  1. वह विनयी होता हैः वह अपनी शारीरिक-मानसिक श्रेष्ठता एवं किसी प्रकार की उत्कृष्ट सफलता पर कभी गर्व नहीं करता और न दूसरों को अपने से हीन या तुच्छ समझता है।विद्या ददाति विनयम्।

  1. वह स्वाध्यायी होता हैः वह संयम, सेवा, सदाचार व ज्ञान प्रदान करने वाले उत्कृष्ट सदग्रन्थों तथा अपनी कक्षा के पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन करने में ही रूचि रखता है और उसी में अपना उचित समय लगाता है, न कि व्यर्थ की पुस्तकों में जो कि उसे इन सदगुणों से हीन करने वाले हों।

  1. वह उदार होता हैः वह दूसरों के गुणों की प्रशंसा करता है, दूसरों को सफलता प्राप्त करने में यथाशक्ति सहायता देने के लिए बराबर तत्पर रहता है तथा उनकी सफलता में खुशियाँ मनाता है। वह दूसरों की कमियों को नज़रंदाज करता है।

  1. वह गुणग्राही होता हैः वह मधुमक्खी की तरह मधुसंचय की वृत्तिवाला होता है। जैसे मधुमक्खी विभिन्न प्रकार के फूलों के रस को लेकर अमृततुल्य शहद का निर्माण करती है, वैसे ही आदर्श बालक श्रेष्ठ पुरुषों, श्रेष्ठ ग्रन्थों व अच्छे मित्रों से उनके अच्छे गुणों को चुरा लेता है और उनके दोषों को छोड़ देता है।

  1. वह ईमानदार और आज्ञाकारी होता हैः वह जानता है कि ईमानदारी ही सर्वोत्तम नीति है। माता-पिता और गुरू के स्व-परकल्याणकारी उपदेशों को वह मानता है। वह जानता है कि बड़ों के आज्ञापालन से आशीर्वाद मिलता है और आशीर्वाद से जीवन में बल मिलता है। ध्यान रहेः दूसरों के आशीर्वाद व शुभकामनाएँ सदैव हमारे साथ रहते हैं।

  1. वह एक सच्चा मित्र होता हैः वह विश्वसनीय, स्वार्थरहित प्रेम देनेवाला, अपने मित्रों को सही रास्ता दिखाने वाला तथा मुश्किलों में मित्रों का पूरा साथ देने वाला मित्र होता है।

 

 

विद्यार्थी और ब्रह्मचर्य

 

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“यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है।”

विद्यार्थी काल शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक विकास का समय है और इस विकास का मुख्य आधार है वीर्यरक्षा ! विद्यार्थी को अपने अध्ययन और प्रवृत्ति  लिए उत्साह, बुद्धिशक्ति, स्मृतिशक्ति, एकाग्रता, संकल्पबल आदि गुणों के विकास की बहुत आवश्यकता होती है। इन सबमें वीर्यरक्षा द्वारा बहुत प्रगति प्राप्त की जा सकती है। इसके विपरीत वीर्यनाश से तन और मन को बहुत नुकसान होता है। वीर्यनाश से निर्बलता, रोग, आलस्य, चंचलता, निराशा और पलायनवादिता के दुर्गुण आ धमकते हैं। इस दुष्प्रवृत्ति का शिकार विद्यार्थी अपने विकासकाल के अति महत्त्वपूर्ण समय को गँवा बैठता है।

विद्यार्थीकाल जीवनरूपी इमारत को बनाने के लिए नींव का पत्थर है। क्या विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है ? यह प्रश्न ऐसा ही है, जैसे कोई पूछेः ‘क्या इमारत के लिए मजबूत नींव की जरूरत है ? मछली को पानी की आवश्यकता है ?’

जीवन में दो विरोधियों को साथ में रखना यह प्रकृति का नियम है। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विवेक होना जरूरी है। विद्यार्थीकाल में जहाँ एक ओर जगत को कँपाने में सक्षम, चाहे जो करने में समर्थ ऐसी प्रचंड वीर्यशक्ति और मौका प्रकृति युवान को देती है, वहीं दूसरी ओर उसके यौवन को लूट लेने वाली विजातीय आकर्षण की सृष्टि भी उसके सामने आ खड़ी होती है।

जिस देश के युवक गुरुकुलों में रहकर 25 वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करके चक्रवर्ती सम्राट, वीर योद्धा आदि बन कर असम्भव जैसे कार्य भी सहज ही कर लेते थे, उसी देश के निस्तेज युवक अपने परिवार को और खुद को भी नहीं सँभाल पाते यह कैसा दुर्भाग्य है। गोलियाँ बरसा के खुद को और अपने परिवार को अकाल मौत के घाट उतार देते हैं।

युवा पीढ़ी को निस्तेज बनाने वाले सेक्सोलॉजिस्टों एवं अखबारों को डॉ निकोलस के इस कथन को पढ़कर अपनी बुद्धि का सुधार करना चाहिए।

डॉ. निकोलस कहते हैं- “वीर्य को पानी की तरह बहाने वाले आजकल के अविवेकी युवाओं के शरीर को भयंकर रोग इस प्रकार घेर लेते हैं कि डॉक्टर की शरण में जाने पर भी उनका उद्धार नहीं होता। अंत में बड़ी कठिन विपत्तियों का सामना करने के बाद असमय ही उन अभागों का महाविनाश हो जाता है।”

यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है, खिलते फूल-सदृश विद्यार्थी-जीवन को निचोड़कर नरकतुल्य बना सकती है। अतः सावधान !

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