भारतीय शिक्षा पद्धति

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  आधार मानव में अंतर्निहित जिज्ञासा की मूल प्रवृत्ति ने सीखने की प्रवृत्ति को जन्म दिया। शैशवावस्था से वृद्धावस्था तक सीखने की यह प्रवृत्ति जीवित रहती है। समय के साथ सीखने के साधन और स्तर बदलते रहते हैं। सीखने की इस प्रवृत्ति को व्यवस्थित करने के लिये शिक्षा की आवश्यकता बनी।

शिक्षा को व्यवस्थित रूप देने के क्रम में दो प्रश्न उभरे। प्रथम ‘क्या’ सिखाया जाए तथा द्वितीय ‘कैसे’ सिखाया जाए? क्या के अन्तर्गत उन विषयों का समावेश हुआ जिनके ज्ञान से मानव समाज में उपयोगी (उत्पादक) भूमिका निभाने में सक्षम हो सके तथा उत्पादक प्रतिभा के सदुपयोग के लिये आवश्यक मानवीय चरित्र का विकास हो। अर्थात् पेशेगत कौशल की शिक्षा तथा चरित्र की शिक्षा। कैसे? का समाधान शिक्षा को गुरु या शिक्षक (अध्यापक) से जोड़कर किया गया। समय के साथ सीखने के विषय तो बदलते रहे पर गुरु या शिक्षक का महत्व नहीं बदला।

व्यक्ति के रूप में मानव की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। व्यक्ति की स्वस्थता पर ही परिवार का सुख, समाज की समृद्धि तथा देश की शान्ति आधारित है। व्यक्ति की स्वस्थता ‘शिक्षा’ पर आश्रित है। अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति का निर्माण शिक्षा का मौलिक लक्ष्य है। स्वस्थ व्यक्ति का अर्थ है, विवेक से युक्त ज्ञान सम्पन्न बुद्धि, विनम्रता से युक्त कर्मठ मन, रोग रहित श्रमशील शरीर। बुद्धि के विवेक से युक्त होने पर मानवीय चरित्र तथा द्वन्द्व रहित निर्णय की क्षमता प्राप्त होती है। ‘ज्ञान’ से मानव को उपयोगी भूमिका निभाने की योग्यता प्राप्त होती है।

विनम्रता से मानव-मानव के बीच सम्बन्धों की मर्यादा का संरक्षण तथा कर्मठता से आर्थिक समृद्धि का द्वार खुलता है। रोग रहित श्रम शील शरीर, बौद्धिक तथा मानसिक प्रेरणाओं को अभिव्यक्त करने में सक्षम होता है। इस प्रकार शिक्षा पर यह दायित्व है कि व्यक्ति के बुद्धि को विवेक से जोड़कर ज्ञान सम्पन्न बनाये। मन में कर्म के प्रति विश्वास और विनम्रता जगाए। और शरीर को स्वस्थ रखने के लिये सन्तुलित आहार तथा श्रम के महत्व को समझाए। अर्थात शिक्षा का मूल प्रयोजन मानव के तीनों आयामों बुद्धि, मन तथा शरीर को स्वस्थ बनाकर उसे सुसभ्य, सुसंस्कृत तथा विकासोन्मुख बनाना है।

गुरु, शिक्षक या अध्यापक शिक्षा का केन्द्र है। ज्ञान के हर विधा की शिक्षा में गुरु की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कोई पढ़कर जितना भी जान ले, पर समझने एवं कार्य रूप में परिणत करने के लिये गुरु की आवश्यकता अपरिहार्य है। कहावत है- ‘करता उस्ताद ना कर्ता शागिर्द’। अर्थात जो ज्ञान की अपनी धरा को कार्य रूप में परिणत करने की योग्यता रखता हो वह गुरु तथा ऐसी योग्यता को पाने की इच्छा रखने वाले शिष्य है।

गुरु व्यक्ति नहीं वरन् गरिमामय पद है। इस पद पर शैशवावस्था से वृद्धावस्था तक अलग-अलग लोग बैठते हैं। सर्वप्रथम इस पद पर ‘मां’ बैठती है। मां से ही बच्चे को पिता एवं अन्य सम्बन्धों का ज्ञान प्राप्त होता है। माता-पिता एवं परिवार से (पांच वर्ष की आयु तक) बोलने, वस्तुओं, अंगों तथा सम्बन्धों को पहचानने का ज्ञान प्राप्त होता है। इसके बाद आचार्य से योग्यता (उत्पादक भूमिका के लिये) का ज्ञान, विवाहित होने पर समाज से दायित्व का ज्ञान, राज्य या राष्ट्र से कर्तव्य का ज्ञान तथा विश्व से अपने वास्तविक स्वरूप (आत्म-बोध) का ज्ञान प्राप्त होना चाहिए। मानव जीवन के हर स्तर पर ज्ञानार्जन के केन्द्र में ‘गुरु’ अवस्थित है।

विश्व की पहचान ‘सन्त’ के माध्यम से, राज्य की राष्ट्र की पहचान ‘राजा’ के माध्य़म से, समाज की पहचान कर्म के माध्यम से तथा सम्बन्धों की पहचान परिवार के माध्यम से तथा योग्यता की पहचान ‘गुरु’ के माध्यम से होती है। ज्ञानार्जन की जिज्ञासा मानव में सृष्टि के आदिकाल से ही दिखाई देती है। इस ज्ञान पिपासा ने वृहद् वैदिक वार्घैंमय को जन्म दिया। इसके अन्तर्गत चार वेद, चार उपवेद, षट्शास्त्र, षट्दर्शन, अट्ठारह पुराण, रामायण, महाभारत आदि आते हैं। इनमें मानव के लिये आवश्यक सभी धाराओं के ज्ञान का संग्रह है। सहस्त्राब्दियों तक इस ज्ञान के अनुकरण से ही ‘भारत’ सोने की चिड़िया बना तथा हर क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास किया।

इस समय हमारे देश में एक ऐसा वर्ग है जिसकी भ्रमपूर्ण सोच के अनुसार अंग्रेजों के आने से पहले देश में शिक्षा का कोई स्वरूप नहीं था तथा देशवासी असभ्य, गंवार और अशिक्षित थे। अपने लगभग दो शताब्दियों के शासनकाल में उन्होंने हमें सुसभ्य और शिक्षित बनाया। यहां इस तथ्य को क्यों नजरअन्दाज किया जाता है कि असभ्य, गंवार और अशिक्षित लोगों से कोई समाज या राष्ट्र ‘सोने की चिड़िया’ नहीं बन सकता। यदि अतीत में सब कुछ बुरा और बिगड़ा था तो साहित्य, संगीत, कला (शिल्प), दर्शन, खगोल आदि क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कैसे हुई?

वैदिक वांर्घैंमय का विशाल ज्ञान भण्डार, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से सम्प्रेषित होता रहा तथा आज भी इसका पूर्णतया लोप नहीं हुआ है। इस सन्दर्भ में आरोप लगता है कि ऐसी शिक्षा मात्र उच्च वर्ण को उपलब्ध थी तथा शूद्र इससे वंचित थे। इस बारे में यहां मेरे एक व्यक्तिगत संस्मरण का उल्लेख आवश्यक लगता है। लगभग पैंतीस वर्ष पूर्व, उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के एक गांव में ठहरा था। वहां ‘बांठे’ नाम के एक मध्यम आयु के हरिजन (चमार) ने मुझे ढोलक की थाप पर अपने सुरीले स्वर में स्थानीय लोक-भाषा में सम्पूर्ण रामायण गाकर सुनाई थी। इससे यह स्पष्ट है कि ज्ञान, उच्च वर्ण तक सीमित नहीं था, वरन् अन्य वर्णों को भी वह सुलभ था।

समाज के हर स्तर पर ज्ञान का सम्प्रेषण श्रुति (श्रवण) परम्परा के माध्यम से बहुत समय तक होता रहा। लोग भले पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे पर उनमें कृषि, शिल्प, वास्तु आदि का ज्ञान भरपूर था। परम्परागत शिक्षा में सुनना, समझना तथा करने का प्रयास शिष्य का कर्तव्य तथा सुनाना, समझाना तथा करके दिखाना गुरु का कर्तव्य था। शिक्षा में लिखने-पढ़ने का प्रयोग महाभारत काल में (लगभग पांच हजार वर्ष) हुआ। उस समय महर्षि वेदव्यास जी ने भविष्य में श्रुति परम्परा का लोप देखकर, सम्पूर्ण वैदिक वार्घैंमय को लिपिबद्ध किया और कराया। अवश्य ही लिखने-पढ़ने से जुड़ी यह शिक्षा उच्च-वर्ण तक सीमित थी। परन्तु लोक-भाषा, लोक-कला, लोकगीत संगीत, लोक-नृत्य तथा लोक साहित्य के माध्यम से ज्ञान का सम्प्रेषण चलता ही रहा। आज भी ज्ञान सम्प्रेषण की इन विधाओं का बहुत बड़ा भाग अलिखित और अपठित है। मात्र श्रवण-परम्परा के माध्यम ये इन सभी विधाओं का आज भी अस्तित्व बना हुआ है।

परम्परागत शिक्षा में गुरु-शिष्य का सम्बन्ध अत्यन्त संवेदनशील तथा आत्मीय था। शिष्य के प्रति स्नेह गुरु का तथा गुरु के प्रति श्रद्धा शिष्य का आवश्यक गुण था। क्योंकि, गुरु से जीवन को सफल एवं विकासोन्मुख बनाने का ज्ञान मिलता था। ज्ञानार्जन के लिए गुरु-शिष्य के बीच किसी अन्य की कोई भूमिका नहीं थी। शिष्य सीधे गुरु से मिलकर ज्ञान की याचना कर सकता था तथा गुरु, शिष्य की जिज्ञासा तथा योग्यता को परखकर उसे स्वीकार करते थे। इसीलिये अतीत में ज्ञान के हर क्षेत्र में शिष्य की पहचान गुरु के माध्यम से होती थी। भले ही विश्वविद्यालय थे पर प्रवेश के लिये गुरु की स्वीकृति सर्वोपरि थी। गुरु के सन्दर्भ में यह आरोप भी लगता है कि यह गरिमामय पद मात्र ब्राह्मणों के लिये सुरक्षित था।

किन्तु वास्तविकता कुछ भिन्न है। ब्राह्मण वैदिक ज्ञान राशि के भंडार थे तथा उसी के शिक्षक होने के अधिकारी थे। ज्ञान की अन्य लौकिक धारायें

जैसे- शिल्प, वास्तु, संगीत, नृत्य, कला आदि पर कभी ब्राह्मणों का एकाधिकार नहीं रहा। इन क्षेत्रों में अन्य वर्णों के लोग भी गुरु के गरिमामय पद पर बैठने के अधिकारी थे। आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में तो शूद्रों को भी गुरु के आसन पर बैठने का पर्याप्त अवसर मिला। पिछले एक हजार वर्ष के इतिहास में सबसे अधिक संख्या शूद्र सन्तों की रही जिनको तत्कालीन समाज के सभी वर्णों से मान्यता मिली तथा भरपूर सम्मान भी। मीरा बाई क्षत्राणी थी और शिष्य बनी सन्त रविदास की। सन्त कबीर जुलाहे थे और बहुत सारे ब्राह्मण-क्षत्रियों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया।

शिक्षा व्यवस्था पर दोहरा दायित्व होता है। प्रथम मानव को ऐसा ज्ञान प्रदान करना जिससे मानव के रूप में वह अपनी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वाह कर सके तथा द्वितीय ऐसा ज्ञान भी प्रदान करे जिससे वह समाज में उत्पादक भूमिका का निर्वाह कर परिवार का भरण-पोषण कर सके। चूंकि पारम्परिक समाज में कर्म का अधिकार, वर्ण के अधिकार पर सुरक्षित था इसलिये उत्पादक भूमिका के निर्वाह की योग्यता पिता के माध्यम से हर व्यक्ति को मिल जाती थी। दूसरी ओर मानव को मानव बनाने की शिक्षा सन्तों, आचार्यों, विद्वानों तथा परिवार-समाज के बड़े बुजुर्गों से मिल जाती थी। अंग्रेजों के आगमन के पूर्व तक भारतीय समाज में शिक्षा के इस पारम्परिक स्वरूप में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ।

वर्ण-व्यवस्था में मानव के कर्म का निर्णय वर्ण के आधार पर हुआ। हर व्यक्ति अपने वर्णानुसार कर्म करने के लिये जन्म से अधिकृत हुआ। इस व्यवस्था में कभी बेकारी की समस्या जन्म नहीं लेती। वर्णानुसार कर्म का अधिकार तथा योग्यतानुसार कर्म का अवसर, वर्ण व्यवस्था की विशेषता बनी। यदि कोई शूद्र पहलवान, संगीतकार, प्रबन्धक आदि बनने की योग्यता रखता तो विकल्प खुले हुए थे। क्योंकि, भारतीय समाज में कर्म के अनुसार जातियां तो थीं। पर जातिवाद नहीं था। जातिवाद का जन्म अंग्रेजों की कुटिल राजनीति के कारण हुआ।

वर्ण-व्यवस्था में शिक्षा प्रायोगिक थी। इसमें लिखने-पढ़ने की आवश्यकता कम और समझने-करने की अधिक थी। पेशेगत योग्यता तो परिवार से मिल जाती थी। पर अन्य क्षेत्रों जैसे नृत्य-संगीत, शिल्प, वास्तु आदि में निपुणता के लिए तद्-तद् विषयों के गुरुओं के शिष्य बनकर शिक्षा लेनी पड़ती थी।

वर्ण व्यवस्था में शिक्षा की एक और विशेषता थी। इसमें हर व्यक्ति के अन्त:करण में अपने वर्णाश्रित कर्म के प्रति श्रद्धा एवं गर्व का भाव विकसित होता था। अर्थात् हर वर्ण का नागरिक अपने कर्म को आदरणीय एवं श्रेष्ठ समझता था। इसमें कर्म, मात्र उदरपूर्ति का माध्यम ही नहीं था वरन् आध्यात्मिक उन्नति का साधन भी था।

उपरोक्त विश्लेषण का यह निष्कर्ष निकला कि भारतीय शिक्षा में गुरु का स्थान सर्वोपरि था।

गुरु-शिष्य के बीच आत्मीय एवं भावनात्मक सम्बन्ध था। किसी भी विद्या की शिक्षा के लिये कोई निर्धारित शुल्क नहीं था। शिष्य गुरु-दक्षिणा अपनी सामर्थ्य के अनुसार देते थे। मानवीय चरित्र का विकास शिक्षा का प्रमुख प्रयोजन था। वर्णाश्रित कर्म के प्रति श्रद्धा, शिक्षा का प्रेरक तत्व था। विद्यार्थी जीवन में सात्विक आहार (शाकाहारी) अनिवार्य था।

बोर्ड की परीक्षा में सफलता के सूत्र .

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बोर्ड की परीक्षा में सफलता के सूत्र .

बोर्ड के एग्जाम शुरू होने को हैं और अब स्टूडेंट्स के साथ पैरंट्स को भी तनाव में देखा जा सकता है। प्रत्येक सब्जेक्ट के पूरे साल की तैयारी की परख महज तीन घंटे के पेपर में आपके प्रदर्शन पर की जाती है और इसी रिजल्ट के आधार पर भावी करियर की दशा और दिशा भी तय होती है। ऐसे में बखूबी इन तीन घंटों के प्रत्येक पेपर के महत्व को समझा जा सकता है। स्कूल टीचर्स के क्लास नोट्स, अपने बनाए नोट्स, विभिन्न गाइड्स, सैम्पल पेपर्स और इतने महीनों की मेहनत को याद रखते हुए एग्जाम के दौरान आंसर शीट में सफलता पूर्वक संजोना ही सफलता और असफलता की सबसे बड़ी चुनौती कही जा सकती है।

अंग्रेजी

– सरल और शब्दों भाषा का भरसक इस्तेमाल करें।

– भाषा प्रवाह और विचारों को प्रेषित करने की परख करना ही इस पेपर का मुख्य उद्देश्य होता है, इसलिए ग्रैमर की शुद्धता, उपयुक्त शब्दों का प्रयोग, स्पेलिंग की गलतियों से बचना आदि पर अधिक ध्यान होना चाहिए।

– स्लैंग लैंग्वेज और अधूरे शब्दों का प्रयोग किसी भी हालत में न करें।

– फ्लावरी लैंग्वेज और भारी भरकम शब्दों के प्रयोग से एग्जामिनर प्रभावित नहीं होता है, बल्कि स्पेलिंग और वाक्य रचना में गलतियां होने की आशंका बढ़ जाती है।

हिंदी

– लिखावट पठनीय होनी चाहिए और जल्दबाजी की झलक बिल्कुल नहीं मिलनी चाहिए।

– आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है। मुश्किल शब्दों के बदले आसान शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं।

– वाक्यों में एक ही शब्द की बार-बार दोहराने से पढ़ने वाले को अटपटा लग सकता है और यह भी संदेश जाने-अनजाने एग्जामिनर को चला जाता है कि आपके पास शब्द भंडार नहीं है।

– कुछ परीक्षार्थी शब्द संख्या बढ़ाने या उत्तर को लंबा खींचने के चक्कर में शुरुआती वाक्यों को बाद में भी दुबारा लिख देते हैं। इससे नुकसान ज्यादा हो सकता है।

संस्कृत

– वर्तनी पर अत्यंत ध्यान दिया जाना चाहिए अन्यथा जरा सी लापरवाही से अर्थ बदल सकता है।

– लेखन में संधि, समास, लिंग, वाच्य, लकार इत्यादि का उपयुक्त तरीके से इस्तेमाल करें।

– व्याकरण आधारित प्रश्नों को पहले किया जा सकता है। इससे अन्य सवालों के लिए ज्यादा वक्त मिल जाएगा।

मैथ्स

– सवाल को कॉपी पर लिखने के बाद एक बार जरूर चेक करें कि सही लिखा है या नहीं।

– याद रखें कि फॉर्म्यूला और जवाब लिखने भर से पूरे अंक नहीं मिलते हैं।

– प्रत्येक गणितीय सवाल के सामने रफ कैल्कुलेशंस अवश्य दर्शाएं ताकि एग्जामिनर को पता चल सके कि सवाल आपने कैसे हल किया है।

– स्टेवाइज हर सवाल को हल करें। यह नहीं भूलें कि स्टेप के मुताबिक ही अंक देने की मार्किंग स्कीम एग्जामिनर को बोर्ड की ओर से दी जाती है।

– हर हालत में फॉर्म्यूला लिखना न भूलें।

– अंकों की ओवर राइटिंग करने से बचें, बेहतर होगा कि काट कर दोबारा लिख दें।

– अंतिम जवाब के साथ यूनिट का उल्लेख करना नहीं भूलें अन्यथा अंक काटे जा सकते हैं।

– ऑल्टरनेटिव मैथड्स को भी स्वीकार किया जाता है और आनुपातिक आधार पर अंक देने का प्रावधान है।

फिजिक्स

– परिभाषाओं की भाषा को अपने शब्दों में लिखने का प्रयास अर्थ का अनर्थ कर सकता है।

– जहां जरूरी हो साइंटिफिक सिंबल का इस्तेमाल करें।

– न्यूमेरिकल्स हल करने में फॉर्म्यूलों और यूनिट्स का उल्लेख जरूर करें।

– अपनी अवधारणाओं को स्पष्ट लिखें। यह कतई नहीं मानकर चलें कि एग्जामिनर समझ लेगा।

कैमिस्ट्री

– कैमिकल इक्वेशन में बैलेंसिंग की जांच जरूर कर लें।

– न्यूमेरिकल्स हल करने में फॉर्म्यूला जरूर लिखें। इसके भी अंक होते हैं।

– कैमिकल प्रक्रिया के बारे में लिखते समय छोटे-से-छोटा तथ्य भी क्रमानुसार लिखना न भूलें।

– लंबे जवाब न लिखें। बिंदुवार जवाब लिखने से अच्छा प्रभाव पड़ता है।

– जरूरत के अनुसार चिह्नित डायग्राम बनाने चाहिए।

बायॉलजी

– कम अंकों वाले प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में ही निर्देशानुसार ही लिखें और ज्यादा वक्त अधिक जानकारियां देने में लगाने से बचें।

– डायग्राम के साथ कैप्शंस और अलग-अलग हिस्सों के नाम लिखना न भूलें।

– कोशिश करें कि एनसीईआरटी टेक्स्ट बुक्स की परिभाषाओं और भाषा का ज्यादा इस्तेमाल हो।

अकाउंट्स

– गलत अकाउंट या खाते में पोस्टिंग करने से बचें।

– अकाउंट की कैलक्युलेशन मिस्टेक्स से बचें।

– अकाउंट्स की गलत फॉर्मेटिंग नहीं होनी चाहिए।

– गलत और अधूरे विवरण नहीं दें। लेजर अकाउंट, जर्नल और स्टेटमेंट का नाम/विवरण जरूर दें।

– रेश्यो बेस्ड सवालों में यूनिट्स जरूर लिखें। जैसे टर्न ओवर रेश्ओ और प्रोफिटेबिलिटी रेश्यो आदि।

– अकाउंट/स्टेटमेंट एक ही पेज पर पूरा करने की कोशिश करें।

– रफ नोट्स जहां कहे गए हों, जरूर दर्शाएं।

बिजनस स्टडीज़

– कंसेप्ट्स को बेहद सरल भाषा में प्रस्तुत करें। उदाहरण के साथ प्रस्तुत कर सकें तो और बेहतर होगा।

– अगर याद नहीं आ रहे हों, तो बुनियादी बिजनस की समझ के आधार पर भी कई सवालों के जवाब दिए जा सकते हैं।

– याद रखें कि बिंदुवार ढंग से ही जवाब अंकों के मान के मुताबिक लिखें।

हिस्ट्री

– महज चंद शब्दों या पहले वाक्य को पढ़कर जल्दबाजी में सवालों के जवाब लिखना न शुरू करें। पूरे क्वेस्चन पेपर को पढ़कर ही तय करें कि क्या जवाब लिखना है।

– अंकों या शब्दों की सीमा के अनुसार उत्तर लिखें। ज्यादा लंबे उत्तर लिखने से अधिक अंक नहीं मिलने वाले। लंबे उत्तर पॉइंट/छोटे पैराग्राफ बनाकर लिखें तो ज्यादा अच्छा होगा।

– जहां जरूरी हो कंटेम्पररी हिस्ट्री के उदाहरण देकर समझाने का प्रयास कर सकते हैं।

– ऐनालिटिकल (विश्लेष्णात्मक) उत्तर देने का प्रयत्न करें।

इकनॉमिक्स

– प्रयास करें कि हैल्प बुक्स या गाइड्स की जगह एनसीईआरटी टेक्स्ट बुक की भाषा का प्रयोग करें।

– यथासंभव लेबल्ड डायग्राम भी उत्तरों तार्किक बनाने के लिए साथ में बनाएं।

– फॉर्म्यूलों को न्यूमेरिकल शुरू करने से पहले लिखना नहीं भूलें।

– अधिक अंकों के सवालों के जवाब लिखने में छोटे छोटे पैराग्राफ्स में अपनी बातों को रखें।

– अस्पष्ट या अधूरे तथ्यों को लिखने से बेवजह अपना इम्प्रेशन खराब कर सकते हैं। ऐसे में नहीं लिखना ही बेहतर होगा।

(नोट- सोश्यॉलजी, जिऑग्रफ़ी, सायकॉलजी, फिजिकल एजुकेशन आदि पेपर्स में भी ऊपर बताई गई सावधानियां बरतें।)

एग्जामिनेशन हॉल के लिए जरूरी टिप्स:

– टाइम मैनेजमेंट में परेशानी नहीं हो, इसलिए आपके पास घड़ी जरूर होनी चाहिए।

– समूचे क्वेस्चन पेपर को पढ़ें। पढ़ने के साथ ही जवाब लिखने की रूपरेखा भी दिमाग में बनाते जाएं, तो बाद में आसानी होगी।

– जरूरी नहीं कि पेपर में दिए गए सवालों के क्रम में ही जवाब लिखे जाएं। जिस सवाल का जवाब आपको सबसे अच्छी तरह से आता हो बेशक वहीं से जवाब लिखने की शुरुआत करें। इससे एग्जामिनर पर अच्छा शुरुआती प्रभाव पड़ता है और अच्छे अंक देने में उसके हाथ रुकते नहीं हैं।

– ध्यान रखें कि एक खंड के सवालों के जवाब एक साथ हों, उन्हें दूसरे खंड के साथ नहीं मिलाएं।

– सही प्रश्न संख्या जवाब लेखन से पहले लिखने की आदत डालें।

– ज्यादा अंकों वाले सवालों और खंड को पहले हल करने से बचे हुए सवालों के लिए ज्यादा वक्त बचा सकते हैं।

– भरसक कोशिश करें कि सवालों के अंकों के मुताबिक बिंदुवार ढंग से जवाब लिखे जाएं। इन बिंदुओं के वाक्य अधूरे नहीं होने चाहिए।

– मैथ्स, फिजिक्स, अकाउंट्स सरीखे क्वेस्चन पेपर्स में स्टेप्स पर आधारित मार्किंग होती है। इसलिए जल्दबाजी में स्टेप्स छोड़ने की भूल न करें।

– एग्जामिनर का ध्यान मुख्य बिंदुओं की ओर आकर्षित करने के लिए सब हैडिंग्स और महत्वपूर्ण तथ्यों को रेखांकित करना न भूलें।

– जवाब को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए विद्वानों/विशेषज्ञों आदि के विचार देने में हर्ज नहीं है।

– निर्धारित शब्द सीमा में उत्तर सीमित रखने की कोशिश करें। किसी वजह से ज्यादा शब्द हो भी जाते हैं तो उनके अंक नहीं काटे जाते।

– भाषा के प्रश्न पत्र में वर्तनी और व्याकरण की गलतियों के अंक अवश्य काटे जाते हैं, जबकि शेष विषयों में तथ्यों की गलतियों के अंक काटे जाते हैं।

– बोर्ड एग्जाम के कई सवाल कभी-कभी बहुत उलझाने वाले होते हैं, बेशक अधिक समय लगाते हुए ध्यानपूर्वक उन्हें समझते हुए उत्तर लिखें।

– तुलना करने पर आधारित सवालों में टेबल बनाकर अंतर स्पष्ट करना ज्यादा अच्छा माना जाएगा।

– अगर किसी सवाल में सिर्फ दो ही बिंदु लिखने को कहा गया है तो शुरू में श्रेष्ट दो बिंदुओं को ही लिखें, तीसरे बिंदु पर गौर नहीं किया जाएगा।

– डायग्राम सिर्फ पेंसिल से बनाएं।

– अगर आपने किसी जवाब को दोबारा लिखा है, तो पहले लिखे हुए जवाब को काटना न भूलें अन्यथा जो पहले का उत्तर होगा उसके ही अंक शामिल किए जाएंगे दोबारा लिखे गए जवाब को नहीं माना जाएगा।

– कोई भी सवाल छोड़ें नहीं। अगर ज्यादा नहीं भी आता हो, तो जितना पता है उतना अवश्य लिख कर आएं।

– लिखावट इतनी स्पष्ट अवश्य हो कि एग्जामिनर को पढ़ने में ज्यादा माथापच्ची नहीं करनी पड़े अन्यथा नहीं समझ आने पर नंबर मिलने मुश्किल होंगे।

– एग्जाम खत्म होने से पहले कम-से-कम 15 मिनट का वक्त जरूर आपके पास बचना चाहिए ताकि पूरी आंसर शीट को दोबारा पढ़ सकें और गलतियों को वक्त रहते सुधार सकें।

– अंत में एग्जामिनेशन हॉल छोड़ने से पहले चेक कर लें कि आपने कोई सवाल छोड़ा तो नहीं है?

अगर नर्वस या ब्लैंक हो जाएं:

– बिल्कुल घबराएं नहीं और पानी पीकर एक मिनट का ब्रेक लें। इसके बाद समूची ऊर्जा और कॉन्संट्रेशन के साथ दुबारा सोचें। ऐसा कभी-कभी ज्यादा तनाव अथवा ठीक से नहीं सोने की वजह से हो जाता है।

– शांति से याद करने की कोशिश करें कि प्रश्न किस चैप्टर से पूछा गया है और आपने इस बारे में क्या पढ़ा था। कॉन्सेप्ट्स याद आने लगेंगे और आप उन्हें लिखते जाएं।

– बेशक कम महत्व के बिंदुओं को भी आप ऐसे में लिखते चलें।

– ज्यादा समय एक सवाल पर न लगाते हुए थोड़ी जगह बाद में लिखने के लिए छोड़कर अगले सवाल पर वक्त दें। बाद में याद आने पर आप नए बिंदु लिख सकते हैं।

– विश्वास रखें कि दो-तीन सवालों के बाद ही आपका आत्मविश्वास वापस आने लगेगा।

पेपर पढ़ने के 15 मिनट्स का कैसे सदुपयोग करें:

– सवालों और निर्देशों को अच्छी तरह से धीरज से पढ़कर समझ लें।

– वैकल्पिक सवालों को भी इसी क्रम में छांट लें कि किनके जवाब देने हैं और किन्हें छोड़ना है। बेशक प्रश्न पत्र पर ही चुने गए सवालों पर निशान लगा सकते हैं।

– इसी दौरान तय कर लें कि किन सवालों के जवाब पहले लिखने हैं। सवालों को समझने में दिक्कत हो तो दोबारा पढ़ें।

जवाब लिखने का बेहतर तरीका:

इसमें कोई शक नहीं कि सुंदर, साफ और स्पष्ट लिखावट का अच्छा शुरुआती असर एग्जामिनर पर पड़ता है। पहले इम्प्रेशन के प्रभाव के कारण कुछ अधिक अंक देने में उसे परेशानी नहीं होती है। इसलिए-

– उत्तर पुस्तिका के प्रत्येक पृष्ठ के दोनों और हाशिये छोड़कर लिखना शुरू करें ताकि एग्जामिनर को अंक देने और अपने कॉमेंट्स देने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके।

– अच्छी राइटिंग के लिए सिर्फ अक्षरों को पूरा और स्पष्ट लिखने की जरूरत होती है।

– नीले पेन का ही लिखने में प्रयोग करें।

– प्रत्येक जवाब के बाद कम-से-कम दो लाइनें अवश्य छोड़ें।

– भरसक प्रयास करें कि काट-पीट कम-से-कम हो।

– ओवर राइटिंग से बचें।

– जवाबों के मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करें।

– अगर किसी जवाब को पूरी तरह से काटकर दुबारा लिख रहे हैं तो एग्जामिनर के लिए इस आशय का नोट साथ में अवश्य लिख दें ताकि उसे तलाश करने में परेशानी न हो।

– अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल न करें।

आम गलतियां:

– लापरवाही के कारण कम-से-कम दो पेन और जिऑमेट्री का बॉक्स साथ लेकर नहीं जाने की प्रवृति।

– एक्स्ट्रा शीट पर नाम, रोल नंबर और सब्जेक्ट आदि नहीं लिखने की लापरवाही।

– गलत टायमिंग या जरूरत से ज्यादा लिखने के चक्कर में वक्त की कमी होना और कुछ प्रश्नों का छूटना।

– दूसरों को बताने या पूछने का रिस्क लेना और वक्त बर्बाद करना।

– लालच में पड़कर नकल करने की कोशिश।

– बेतरतीब और अतार्किक तरीके से जवाब की प्रस्तुति।

– ज्यादा छोटे अक्षर या बहुत बडे़ अक्षरों का प्रयोग।

परीक्षा से पहले के 24 घंटे:

– इस दौरान अधिक तनाव या ज्यादा पढ़ाई के दबाव में आने से बचें।

– सिर्फ अपने नोट्स/अहम सवालों के रिविजन तक ही सीमित रहे।

– कुछ नया पढ़ने की कोशिश न करें। इससे फायदा कम, नुकसान ज्यादा हो सकता है।

– थोड़ा-बहुत मनोरंजन और सैर जरूर करें ताकि ताजगी बरकरार रहे।

– सोशल साइट्स पर मनोरंजन के नाम पर वक्त न बिताएं।

– झगड़े-लड़ाई या किसी दूसरे तरह के मानसिक तनाव से बचें।

– शाम के वक्त कुछ हल्का खा लें और जल्दी सो जाएं ताकि पूरी नींद ले सकें।

– सुबह जल्दी उठकर एक बार अहम अंशों की ठीक से दुहरा लें।

– वक्त रहते तैयार हों और नाश्ता कर वक्त से पहले परीक्षा हॉल में पहुंचें। भागते-दौड़ते पहुंचने पर बेकार का तनाव हो सकता है और उसका असर पेपर पर पड़ सकता है। इतना ही नहीं देरी होने पर लिखने का बहुमूल्य वक्त गवां सकते हैं।

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विद्यार्थी और ब्रह्मचर्य

 

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“यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है।”

विद्यार्थी काल शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक विकास का समय है और इस विकास का मुख्य आधार है वीर्यरक्षा ! विद्यार्थी को अपने अध्ययन और प्रवृत्ति  लिए उत्साह, बुद्धिशक्ति, स्मृतिशक्ति, एकाग्रता, संकल्पबल आदि गुणों के विकास की बहुत आवश्यकता होती है। इन सबमें वीर्यरक्षा द्वारा बहुत प्रगति प्राप्त की जा सकती है। इसके विपरीत वीर्यनाश से तन और मन को बहुत नुकसान होता है। वीर्यनाश से निर्बलता, रोग, आलस्य, चंचलता, निराशा और पलायनवादिता के दुर्गुण आ धमकते हैं। इस दुष्प्रवृत्ति का शिकार विद्यार्थी अपने विकासकाल के अति महत्त्वपूर्ण समय को गँवा बैठता है।

विद्यार्थीकाल जीवनरूपी इमारत को बनाने के लिए नींव का पत्थर है। क्या विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है ? यह प्रश्न ऐसा ही है, जैसे कोई पूछेः ‘क्या इमारत के लिए मजबूत नींव की जरूरत है ? मछली को पानी की आवश्यकता है ?’

जीवन में दो विरोधियों को साथ में रखना यह प्रकृति का नियम है। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विवेक होना जरूरी है। विद्यार्थीकाल में जहाँ एक ओर जगत को कँपाने में सक्षम, चाहे जो करने में समर्थ ऐसी प्रचंड वीर्यशक्ति और मौका प्रकृति युवान को देती है, वहीं दूसरी ओर उसके यौवन को लूट लेने वाली विजातीय आकर्षण की सृष्टि भी उसके सामने आ खड़ी होती है।

जिस देश के युवक गुरुकुलों में रहकर 25 वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करके चक्रवर्ती सम्राट, वीर योद्धा आदि बन कर असम्भव जैसे कार्य भी सहज ही कर लेते थे, उसी देश के निस्तेज युवक अपने परिवार को और खुद को भी नहीं सँभाल पाते यह कैसा दुर्भाग्य है। गोलियाँ बरसा के खुद को और अपने परिवार को अकाल मौत के घाट उतार देते हैं।

युवा पीढ़ी को निस्तेज बनाने वाले सेक्सोलॉजिस्टों एवं अखबारों को डॉ निकोलस के इस कथन को पढ़कर अपनी बुद्धि का सुधार करना चाहिए।

डॉ. निकोलस कहते हैं- “वीर्य को पानी की तरह बहाने वाले आजकल के अविवेकी युवाओं के शरीर को भयंकर रोग इस प्रकार घेर लेते हैं कि डॉक्टर की शरण में जाने पर भी उनका उद्धार नहीं होता। अंत में बड़ी कठिन विपत्तियों का सामना करने के बाद असमय ही उन अभागों का महाविनाश हो जाता है।”

यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है, खिलते फूल-सदृश विद्यार्थी-जीवन को निचोड़कर नरकतुल्य बना सकती है। अतः सावधान !

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स्मरणशक्ति तीव्र करने में सहायक !”सूर्यनमस्कार ”

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प्राचीनकाल में हमारे ऋषि मुनियों ने मंत्र और व्यायाम सहित एक ऐसी आसन् प्रणाली विकसित की, जिसमें सूर्योपासना का भी समावेश है। इसे सूर्यनमस्कार कहते हैं। इसके नियमित अभ्याससे शारीरिक और मानसिक स्फूर्ति की वृद्धि के साथ विचारशक्ति और स्मरणशक्ति भी तीव्र होती है। पश्चिमी वैज्ञानिक गार्डनर रोनी ने कहा हैः ʹसूर्य श्रेष्ठ औषधि है। सूर्य की किरणों के प्रभाव से सर्दी, खाँसी, न्यूमोनिया और कोढ़ जैसे रोग भी दूर हो जाते हैं।ʹ डॉ. सोले कहते हैं- ʹसूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति है, उतनी संसार की किसी अन्य चीज में नहीं है।ʹ सूर्योदय, सूर्यास्त, सूर्यग्रहण और मध्याह्न के समय सूर्य की ओर कभी न देखें, जल में भी उसका प्रतिबिम्ब न देखें।

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विश्व की प्राचीनतम भाषा

 

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परिचय
“भाषा” यह मानव सभ्यता के आविष्कारों मे सबसे अप्रतिम आविष्कार है । भाषा वह साधन है जो सोचने एवं भाव व्यक्तिकरण में अत्यावश्यक है; उसीके ज़रीये विश्वभर में महान कार्यों का संपादन होता रहा है । समस्त विश्व में जिस “विकास” की बातें हम सुनते रहते हैं, वह कभी संभव न होता यदि भाषा न होती ! और फिर भी इस महान आविष्कार को हम कितना सहज समज लेते हैं !

भाषाओं के इतिहास में भारत का योगदान महत्त्वपूर्ण है, क्यों कि उसने ऐसी भाषा का आविष्कार किया जो हर तरह से शास्त्रीय हो ! वह भाषा याने ‘संस्कृत’, जिसके बल पर भारतमाता और उसकी उत्तुंग संस्कृति मानार्ह बनी ।

वे कहते हैं….

श्री जवाहरलाल नेहरु ने कहा है, “यदि मुझे पूछा जाय कि भारत का सर्वश्रेष्ठ खज़ाना कौन-सा और उसकी सबसे बडी विरासत कौन-सी, तो बिना ज़िझक कहुंगा ‘संस्कृत भाषा, साहित्य, उसके भीतर रहा हुआ सब कुछ’ । यह सर्वोत्तम विरासत है और जब तक ये जियेंगी, जन-मानस को प्रभावित करेगी, तब तक भारत की न्यूनतम गरिमा का स्रोत बना रहेगा ।“

सर विलियम जॉन्स, जिन्हों ने सन 1786 में पाश्चात्य जगत में यह ऐलान कर दिया कि, “संस्कृत वह भाषा है जो ग्रीक से अधिक पूर्ण है, लेटिन से अधिक समृद्ध है, और दोनों से हि अधिक सूक्ष्म-शुद्ध है । सर्व भाषाओं की जननी संस्कृत, सबसे प्राचीन, सबसे पूर्ण है ।

वाङ्ग्मय

कुछ सहस्र वर्षों के मानव अस्तित्व का सर्वेक्षण करें तो संस्कृत भाषा शिरोमणि के रुप में उभर आती है । वैदिक काल से उद्गम होने वाली संस्कृत, उसके उत्तरीय कालों से गुज़रती हुई, कई सदीयों के पश्चात् आज तक नव पल्लवित होती रही है । जब अन्य भाषाएँ केवल जन्म ले रही थी, संस्कृत सृजनशील व मनीषी रचनाओं का माध्यम बन चूकी थी । संस्कृत वाङ्ग्मय का केवल व्याप भी विस्मयकारक है ! अपौरुषेय वेदों ने, अन्य वेदकालीन रचनाओं एवं उत्तरकालीन संस्कृत रचनाओं के लिए मजबूत नींव डाली ।

वैदिक साहित्य

संस्कृत रचनाएँ भाषा-भेद के कारण दो अलग काल में रची गयी दिखाई पडती है – वैदिक, अर्थात् जो वैदिक संस्कृत में रची गयी, और पारंपारिक, जो वेदोत्तर काल में रची गयी । इन में से पारंपारिक या प्रचलित संस्कृत, करीब इ.पू. 400 तक राजकीय भाषा बन चूकी थी । वैदिक वाङ्ग्मय पुरातन होने के कारण उसके काल के विषय में काफी अनिश्चिति पायी जाती है; यहाँ पर हमने कुछ सामान्य काल-मान्यता का उपयोग किया है ।

प्राचीन वैदिक काल पद्यमय और सृजनशील समय था, किंतु उसके उत्तरार्ध में ब्राह्मणों ने अपनी इन शक्ति, होम-यज्ञादि विधि-निषेधों की ओर मोड दी जिसमें से गद्यमय “ब्राह्मण” ग्रंथों का निर्माण हुआ । समय के साथ ये ब्राह्मण ग्रंथ भी मूल वेदों की भाँति “श्रुति” (अर्थात् “अनुभूत किया हुआ”) कहलाये । वैदिक वाङ्ग्मय इन प्रकृति-पूजन, विद्या-कला, विधि-निषेधों और कर्मकांड से लेकर ब्रह्मविद्या की ओर प्रगत हुआ, जो “आरण्यक” कहलाया । इन्हीं आरण्यकों का उत्तरार्ध गहन तत्त्वचिंतन में परिणत हुआ और “उपनिषद” कहलाया ।

इससे विपरीत, वेदोत्तर साहित्य में “स्मृति” ग्रंथों का सर्जन हुआ जो वेद-आधारित था परंतु, श्रुतिग्रंथों के मुकाबले अधिक जीवनस्पर्शी था । ब्रह्मविद्या में शुद्ध और अनुभूति विषयक ज्ञान होने से “श्रुति” ग्रंथ त्रिकालाबाधित कहलाये, पर ऋषियों ने कहे उन जीवनमूल्यों को चरितार्थ करने के लिये, कालानुसार “स्मृति” ग्रंथों की रचना हुई ।

“सूत्रों” का काल (इ.पू. 200 – 500) वैदिक-वाङ्ग्मय रचना में अंतिम माना जाता है । उनका वर्ण्य विषय था वैदिक एवं स्मार्तिक (स्मृति अधिष्ठित) परंपराओं का संकलन । इस समय तक अत्याधिक श्रुति और स्मृतिग्रंथों की रचना हो चूकी थी, और उनके गहन एवं पद्यमय वाङ्ग्मय का संक्षिपीकरण करना आवश्यक हो गया था, जो सूत्रों ने किया । “सूत्र” दो प्रकार के हुए; श्रौत सूत्र जो श्रुति अधिष्ठित थे, और गृह्य सूत्र जो स्मृति अधिष्ठित थे । गृह्य सूत्रों का वह भाग जो सामाजिक एवं कर्तव्याचरण विषयक था, उन्हें “धर्मसूत्र” कहा गया – जो कि भारतीय कानून व्यवस्था का बीज रुप साहित्य माना जाता है ।

“सूत्रों” के तहद जो साहित्य सर्जित हुआ उन्हें छे वेदांगों में विभाजित किया गया;
शिक्षा – ध्वनि संदर्भित शास्त्र
छंद – पद्य रचनाओं का संघटन शास्त्र
व्याकरण – भाषा शास्त्र
निरुक्त – शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र
कल्प – धार्मिक विधि इ.
ज्योतिष – खगोल विद्या

संस्कृत साहित्य

वैदिक वाङ्ग्मय के इस पर्यंत साहित्य सर्जन में कुछ-एक हजार साल व्यतित हुए होंगे ! अपौरुषेय माने जानेवाले वेदों के बारे में ऐसा कहना ठीक न होगा, पर ज्ञात मानव इतिहास की परिभाषा में ऐसा मान लेने में ज़ादा हानि भी नहीं । यूँ भी “अपौरुषत्व” शुद्ध प्रज्ञावाचक संज्ञा है और न कि कालवाचक !

इतने दीर्घ समय दौरान वैदिक भाषा में अप्रतिम वैविध्य, भेद या परिवर्तन हो जाना सहज था । इसी लिए महामुनि श्री पाणिनी ने वैदिक व्याकरण व भाषा नियमों को सुसंबद्ध किया । इसका काल करीब इ.पू. 350 का माना जाता है, जो कि “सूत्रों” के सर्जन का काल भी था । पाणिनीय व्याकरण सांप्रत या प्रचलित संस्कृत की जननी माना जाता है, और यहीं से मध्यकालीन संस्कृत साहित्य सर्जन की यात्रा आरंभ हुई दिखती है ।

संस्कृत नाट्यशास्त्रों के मूल ऋग्वेद के उन मंत्रों में हैं जो संवादात्मक हैं । इन नाट्यशास्त्रों की विशेषता है कि इनमें शोकान्तिकाएँ नहींवत् है । इनमें आनेवाली कहानियाँ, प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है । नाट्यों की सुरुआत प्रार्थना से होती है और उसके तुरंत बाद रंगमंच प्रस्थापक और किसी अभिनेता के बीच संवाद द्वारा, नाट्य के रचयिता और नाट्य विषय की जानकारी प्रस्तुत की जाती है । कालिदास, भाष, हर्ष, भवभूति (दण्डी) इत्यादि संस्कृत के विद्वान नाट्यकार हो गये । इनकी अनेक रचनाओं में से श्री कालिदास का “शाकुंतल” आज भी लोगों को स्मरण है ।

संस्कृत विश्व के दो महान महाकाव्यों की भी जनेता है; श्री वाल्मीकि रचित रामायण, और श्री व्यासजी रचित महाभारत । इन दो महाकाव्यों ने अनेकों वर्षों तक भारतीय जीवन के हर पहेलु को प्रभावित किया, और भारतीयों को उन्नत जीवन जीने के लिए प्रेरित किया । इन महाकाव्यों ने शासन व्यवस्था, अर्थप्रणालि, समाज व्यवस्था, मानसशास्त्र, धर्मशास्त्र, शिक्षणप्रणालि इत्यादि विषयों का गहन परिशीलन दिया । इन इतिहास ग्रंथों के अलावा, संस्कृत में अनेक पुराण ग्रंथों का भी सर्जन हुआ जिनमें देवी-देवताओं के विषय में कथाओं द्वारा सामान्य जनमानस को बोध कराने का प्रयत्न किया गया ।

संस्कृत साहित्य सर्जन को अधिक उत्तेजन मिला जब नाट्यकार श्री भरत (प्राचीन संगीतज्ञ – इ.पू. 200) ने “नाट्य शास्त्र” रचा । यह ग्रंथ नाट्य विश्लेषण का बाइबल माना जाता है । प्रारम्भिक काल के नाट्यों में श्री भाष का योगदान महत्त्वपूर्ण था, पर कालिदास के “शाकुंतल” की रचना होते ही वे विस्मृत होते चले । शाकुंतल सदीयों तक नाट्यरचना का नमूना बना रहा । शाकुंतल शृंगार और वीर रस वाचक था, तो श्री शुद्रक का “मृच्छकटिका” सामाजिक नाटक था । उनके पश्चात् श्री भवभूति (इ. 700) हुए, जिनके “मालती-माधव” और “उत्तर रामचरित” नाट्य प्रसिद्ध हुए ।

मध्यकालीन युग में पंच महाकाव्यों की भी रचना हुई;
श्री कालिदास के “रघुवंश” और “कुमारसंभव”
श्री भारवी का “किरातार्जुनीय” (इ. 550)
श्री माघ का “शिशुपालवध”; और
श्री हर्ष का “नैषधिय चरित”

इन पाँचों महाकाव्यों का प्रेरणास्रोत ग्रंथ “महाभारत” था जो आज भी अनेक लेखकों का मार्गदर्शक है । महाकाव्यों के अलावा प्रेम, नीतिमत्ता, अनासक्ति ऐसे अनेक विषयों पर व्यावहारु भाषा में लघुकाव्यों की रचना भी इस काल में हुई । ऐसी पद्यरचना जिसे “मुक्तक” कहा जाता है, उनके रचयिता श्री भर्तृहरि और श्री अमरुक हुए । श्री भर्तृहरि रचित नीतिशतक, शृंगारशतक और वैराग्यशतक आज भी प्रसिद्ध है ।

दुर्भाग्य से संस्कृत की गद्यरचनाएँ इतनी प्रसिद्ध नहीं हुई, और वे कालप्रवाह में नष्ट हुई । जो कुछ बची, उनमें से श्री सुबंधु की “वासवदत्त”, श्री बाण की “कादंबरी” और “हर्षचरित”, और दंडी की “दशकुमारचरित” प्रचलित हैं ।

नीतिपरकत्व, संस्कृत के सभी साहित्य प्रकार में विदित होता है, पर परीकथाओं और दंतकथाओं (इ. 400 – 1100) में वह अत्यधिक उभर आया है । “पंचतंत्र” और “हितोपदेश” बुद्धिचातुर्य और नीतिमूल्य विषयक कथाओं के संग्रह हैं, जो पशु-पक्षीयों के चरित्रों, कहावतों, और सूक्तियों द्वारा व्यवहारचातुर्य समजाते हैं । वैसे भिन्न दिखनेवाली अनेक उपकथाओं को, एक ही कथा या रचना के भीतर समाविष्ट कर लिया जाता है; मूल कथा का प्रधान चरित्र इतनी उप-कथाएँ बताते जाता है कि मूल रचना अनेक स्तरों में लिखी हुई प्रस्तुत होती है । इस पद्धत का उपयोग पंचतंत्र में विशेष तौर पे किया गया है ।

सूत्रात्मक, संक्षिप्त और फिर भी तीक्ष्ण लेखन “हितोपदेश” में सर्वोत्कृष्ट दिखायी पडता है, जो कि “पंचतंत्र” पर हि आधारित है ।

संस्कृत का अभ्यास क्यों ?
संस्कृत और ज्ञान
यदि आप उन प्रश्नों के जिज्ञासु हैं, जिन्होंने आदि काल से मानवी मन को त्रस्त किया है, तो संस्कृत का अभ्यास अनिवार्य है ।
यदि आप ज्ञानपिपासु हैं, तो संस्कृत का अभ्यास आवश्यक है ।
यदि आप ज्ञानपिपासु नहीं, पर जीवन में सोक्रेटीक अस्वस्थता चाहते हैं, तो संस्कृत का अभ्यास उपयोगी है ।
यदि आप साहित्य-रसिक हैं और साहित्य के अद्भुत विश्व में डूब जाना चाहते हैं, तो संस्कृत ऐसे रत्नों से परिपूर्ण है जो साहित्यिक विश्व को साकारित कर सके ।

संस्कृत और एकता
भाषा वह माध्यम है जो विचारों और भावनाओं को शब्दों में साकारित करती है, और संस्कृति वह बल है जो हम सब को एकसूत्रता में परोती है । पर भारतीय संस्कृति की नींव “संस्कृत” में है ।

“एकता” कृति में चरितार्थ होती है, और कृति की नींव विचारों में है । पर विचारों का आकलन भाषा के बगैर संभव नहीं । तब भाषा ऐसी समृद्ध होनी चाहिए जो गूढ, अमूर्त विचारों और संकल्पनाओं को सम्यक् रुप से आकार दे सकें । जितने स्पष्ट विचार, उतनी सम्यक् कृति; और विचार-आचार की समाज में एकरुपता याने “एकता” ।

आइये सुसंस्कृत बनें ! और उस अंतर को मिटा दें जो प्रांत, वर्ग, वर्ण, भाषा, संप्रदाय और वित्त इत्यादि ने व्यक्ति-व्यक्ति के बीच खडा किया है ।

संस्कृत की गरिमा पढते-सुनते हैं तब उस भाषा के अज्ञान की शर्म आती है । अज्ञान की लज्जा यदि तेजपूर्ण और प्रामाणिक हो, तो वह नये प्रयोजन और नवप्रयोगों की जननी बन सकती हैं । भारत तभी स्वस्थ खडा हो सकता है, जब भारतमाता की सपूत संतान वह भाषा समज सकेगी जो उनकी माँ बोलती है, और वह भाषा याने ‘संस्कृत’ ।

बुद्धिमत्ता और विज्ञानवाद की कूद यदि प्रामाणिक होगी, तो विश्व भारत के इस भाषा-रत्न को मरने नहीं देगा । समाज का सज्जन वर्ग यदि ध्येयबद्ध और प्रयत्नशील रहा, तो वैदिकों का अप्रतिम तप ज़रुर यशदायी होगा, और संस्कृत को खोयी हुई गरिमा पुनः प्राप्त करा देगा । सत्त्व के प्रेरक ईश्वर से यही प्रार्थना है कि हमारे बाल-कदमों को तेजोपूर्ण उन्नत कूद प्रदान करें !

http://youtu.be/zmpEa7cLo8c

भारतीय शिक्षा पद्धति मैकाले मा‍नसिकता वाली है

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 Indian Education Act बनाया गया आज हमारी शिक्षा व्यवस्था इसी कानून पर आधारित है यह मैकोले नाम के अँगरेज़ ने बनायीं थी हमें गुलाम बनाने के लिए और हमारी महान सभ्यता और संस्कृति को नस्ट करने के लिए…..मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो भारत कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से भारतीय लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे,मैकाले का भूत आज सबसे अधिक प्रसन्न होगा, यह देखकर कि 179 साल पहले की गयी उसकी भविष्यवाणी सही साबित हुई!

मैकोले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है “कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी” इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया, और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया उनमे आग लगा दी, उसमे पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला, सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे फ्री स्कूल कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं और हमारी शिक्षा व्यवस्था मकौले का वही Indian Education Act है………….अर्थात आज भी हमारे भारत में वही शिक्षा व्यवस्था चल रही है जो मैकोले ने हमें गुलाम बनने के लिए बनायीं थी और आज यही कारण है कि अपनी महान संस्कृति को हम स्वयं ही शिक्षा के नाम पर नस्ट करने में व्यस्त हैं…….और सच्चाई यही है कि हमारा अध्यात्म हमारी संस्कृति आज के विज्ञानं से अत्यधिक उच्च और सम्पन्न है आवश्यकता है तो उसे अपनाने की और मैकोले के षड़यंत्र को विफल करने की……!

यह तभी संभव है जब हम इस Indian educational act के षड़यंत्र को नस्ट कर पायें…………”गुरुकुल” के बारे में बहुत से लोगों को यह भ्रम है की वहाँ केवल संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी जो की गलत है यह Indian Education Act द्वारा फैलाया गया भ्रम है । 1820 में विलियम एडम नाम का एक अँगरेज़ आया था……उसने पुरे भारत का सर्वे कराया और ब्रिटिश संसद में 1117 पन्ने की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की उस रिपोर्ट के अनुसार भारत में गुरुकुल भारत की शक्ति और समृद्धि का मुख्य आधार है भारत में विज्ञान की 20 से अधिक शाखाएं रही है जो की बहुत पुष्पित पल्लवित रही है जिसमें प्रमुख १. खगोल शास्त्र २. नक्षत्र शास्त्र ३. बर्फ़ बनाने का विज्ञान ४. धातु शास्त्र ५. रसायन शास्त्र ६. स्थापत्य शास्त्र ७. वनस्पति विज्ञान ८. नौका शास्त्र ९. यंत्र विज्ञान १०. astrophysics ११.चिकित्सा विज्ञानं आदि इसके अतिरिक्त 20 अन्य विषयों कि भी शिक्षा समृद्ध रूप से गुरुकुलों में दी जाती हैं। संस्कृत भाषा मुख्यतः माध्यम के रूप में, उपनिषद एवं वेद छात्रों में उच्चचरित्र एवं संस्कार निर्माण हेतु पढ़ाए जाते हैं।(विलियम एडम के 1117 पन्ने की रिपोर्ट में भारत के विश्वविख्यात उच्चविज्ञान तकनीक को प्रमाणित करने वाले पर्याप्त उदहारण उपलब्ध हैं यहाँ सभी का वर्णन करना सभव नहीं) थोमस मुनरो सन 1813 के आसपास मद्रास प्रांत के राज्यपाल थे, उन्होंने अपने कार्य विवरण में लिखा है मद्रास प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण आंद्रप्रदेश, पूर्ण तमिलनाडु, पूर्ण केरल एवं कर्णाटक का कुछ भाग ) में 400 लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। उत्तर भारत (अर्थात आज का पूर्ण पाकिस्तान, पूर्ण पंजाब, पूर्ण हरियाणा, पूर्ण जम्मू कश्मीर, पूर्ण हिमाचल प्रदेश, पूर्ण उत्तर प्रदेश, पूर्ण उत्तराखंड) के सर्वेक्षण के आधार पर जी.डब्लू.लिटनेर ने सन1822 में लिखा है, उत्तर भारत में 200 लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है।

माना जाता है की मैक्स मूलर ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे अधिक शोध किया है, वे लिखते है “भारत के बंगाल प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण बिहार, आधा उड़ीसा, पूर्ण पश्चिम बंगाल, आसाम एवं उसके ऊपर के सात प्रदेश) में 80 हज़ार से अधिक गुरुकुल है जो कि कई सहस्त्र वर्षों से निर्बाधित रूप से चल रहे है”।
उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत के आकडों के कुल पर औसत निकलने से यह ज्ञात होता है की भारत में 18 वी शताब्दी तक 300 व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल था। एक और चौकानें वाला तथ्य यह है की 18वी शताब्दी में भारत की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ थी, 300 व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल के अनुसार भारत में 7लाख 32 हज़ार गुरुकुल होने चाहिए। अब रोचक बात यह भी है की अंग्रेज प्रत्येक दस वर्ष में भारत में भारत का सर्वेक्षण करवाते थे उसे के अनुसार 1822 के लगभग भारत में कुल गांवों की संख्या भी लगभग 7 लाख 32 हज़ार थी, अर्थात प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल(1834 में मेकॉले के सर्वेक्षण में ऐसे ही तथ्य सामने आते हैं) 16 से 17 वर्ष भारत में प्रवास करने वाले शिक्षाशास्त्री लुडलो ने भी 18वी शताब्दी में यहीं लिखा की “भारत में एक भी गाँव ऐसा नहीं जिसमें गुरुकुल नहीं एवं एक भी बालक ऐसा नहीं जो गुरुकुल जाता नहीं”।

राजा की सहायता के बिना, समाज से पोषित इन्ही गुरुकुलों के कारण 18वी शताब्दी तक भारत में साक्षरता 97%थी, बालक के 5 वर्ष, 5 माह, 5 दिवस के होते ही उसका गुरुकुल में प्रवेश हो जाता था। प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक विद्यार्जन का क्रम 14 वर्ष तक चलता था। जब बालक सभी वर्गों के बालको के साथ निशुल्कः 20 से अधिक विषयों का अध्ययन कर गुरुकुल से निकलता था, तब आत्मनिर्भर, देश एवं समाज सेवा हेतु सक्षम हो जाता था।इसके उपरांत विशेषज्ञता (पांडित्य) प्राप्त करने हेतु भारत में विभिन्न विषयों वाले जैसे शल्य चिकित्सा, आयुर्वेद, धातु कर्म आदि के विश्वविद्यालय थे, नालंदा एवं तक्षशिला तो 2000 वर्ष पूर्व के है परंतु मात्र 150 -170 वर्ष पूर्व भी भारत में 500-525 विश्वविद्यालय थे।

मैकोले 1834 के आस पास भारत आया था …….भारत कि आध्यात्मिक सांस्कृतिक सामाजिक व्यवस्था से वह अत्यंत प्रभावित था उसके सर्वे के रिपोर्ट भी उपलब्ध हैं और आश्चर्यजनक हैं छोटा सा अंश प्रस्तुत करूँगा 2 Feb 1835 में ब्रिटिश पार्ल्यामेंट में दिया गया उसका भाषण “I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a
beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this
country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and
cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and
English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation”……..थोमस बेबिगटन मैकोले (टी.बी.मैकोले) कई वर्षों भारत में यात्राएँ एवं सर्वेक्षण करने के उपरांत समझ गया की अंग्रेजो पहले के आक्रांताओ अर्थात यवनों, मुगलों आदि भारत के राजाओं, संपदाओं एवं धर्म का नाश करने की जो भूल की है, उससे पुण्यभूमि भारत को पराधीन बनाना असंभव है, अपितु संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश करे तो इन्हें पराधीन करने का स्वप्न पूर्ण हो सकता है। इसी कारण “इंडियन एज्यूकेशन एक्ट” बना कर समस्त गुरुकुल बंद करवाए गए। हमारे शासन एवं शिक्षा तंत्र को इसी लक्ष्य से निर्मित किया गया ताकि नकारात्मक विचार, हीनता की भावना, जो विदेशी है वह अच्छा, बिना तर्क किये रटने के बीज आदि बचपन से ही बाल मन में घर कर ले और अंग्रेजो को प्रतिव्यक्ति संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश का परिश्रम न करना पड़े।

मैकोले द्वारा British Parliament में दिए गए भाषण का प्रमाण हमारे वेद पुराण उपनिषद एवं सभी धार्मिक ग्रन्थ आज भी भारत के अध्यात्म और भारत की वैज्ञानिक श्रेष्ठता को दर्शाते हैं किन्तु हमें उन सब से दूर रखा गया है कारण क्या है हमारी वर्तमन शिक्षा व्यवस्था अर्थात मैकॉले का बनाया Indian educational act 1858 हमारी संस्कृति को ढोंग और पाखंड बताता है और दुर्भाग्य यह है की हमने मान भी लिया है मैकोले अपने षड़यंत्र में सफल हुआ है और हम सब कुछ जानते बुझते भ्रम में है पूर्ण रूप से आज भी उसके गुलाम……..
मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमे वो लिखता है कि “इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी और भारत शारीरिक रूप से आजाद होने पर भी मानसिक रूप से हमेशा हमारा गुलाम बना रहेगा” और आज मैकोले कि लिखी चिट्टी कि सच्चाई सामने दिख रही है हमारे भारत में……….अंत में पुन: मेकौले का वह कथन लिख रहा हूँ……

कुछ जीत ऐसी होती हैं जिन पर कभी आंच नहीं आती। यह ऐसा साम्राज्य है जिसे कोई समाप्त नहीं कर सकता। यह अविनाशी साम्राज्य अँग्रेजी भाषा, कला और कानून का है।”हमें अंग्रेज़ी साम्राज्य के विस्तार के लिए एक ऐसा वर्ग बनाना है जो अपनी जड़ों से घृणा करे। वे लोग रंग व रक्त से हिंदुस्तानी होंगे किन्तु आचार-व्यवहार में अंग्रेज़ होंगे।”
यही सच आज हमारे सामने है हम पूरी तरह काले अंग्रेज़ बनते जा रहे है !!
15 अगस्त 1947 से पूर्व हम गुलामी का विरोध करते थे आज हम गुलामी का सम्मान करते हैं……
प्रश्न केवल इतना है यह गुलामी कब तक रहेगी कब तक हम अपनी महान संस्कृति और सभ्यता का अपमान करते रहेंगे……….जो शिक्षा व्यवस्था हमें गुलाम बनाने के लिए बनायीं गयी है कब तक उसे अपनाकर हम गुलाम बने रहेंगे………..कब तक अपमान करते रहेंगे अपने शहीदों का….. उनके सपनों का …

प्राचीन भारतीय शिक्षा

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गुरुकुलों की स्थापना प्राय: वनों, उपवनों तथा ग्रामों या नगरों में की जाती थी। वनों में गुरुकुल बहुत कम होते थे। अधिकतर दार्शनिक आचार्य निर्जनवनों में निवास, अध्ययन तथा चिन्तन पसन्द करते थे। बाल्मीकि, सन्दीपनि, कण्व आदि ऋषियों के आश्रम वनों में ही स्थित थे और इनके यहाँ दर्शन शास्त्रों के साथ-साथ व्याकरण, ज्योतिष तथा नागरिक शास्त्र भी पढ़ाये जाते थे। अधिकांश गुरुकुल गांवों या नगरों के समीप किसी वाग अथवा वाटिला में बनाये जाते थे। जिससे उन्हें एकान्त एवं पवित्र वातावरण प्राप्त हो सके। इससे दो लाभ थे; एक तो गृहस्थ आचार्यों को सामग्री एकत्रित करने में सुविधा थी, दूसरे ब्रह्मचारियों को भिक्षाटन में अधिक भटकना नहीं पड़ता था। मनु के अनुसार `ब्रह्मचारों को गुरु के कुल में, अपनी जाति वालों में तथा कुल बान्धवों के यहां से भिक्षा याचना नहीं करनी चाहिए, यदि भिक्षा योग्य दूसरा घर नहीं मिले, तो पूर्व-पूर्व गृहों का त्याग करके भिक्षा याचना करनी चाहिये। इससे स्पष्ट होता है कि गुरुकुल गांवों के सन्निकट ही होते थे। स्वजातियों से भिक्षा याचना करने में उनके पक्षपात तथा ब्रह्मचारी के गृह की ओर आकर्षण का भय भी रहता था अतएव स्वजातियों से भिक्षा-याचना का पूर्ण निषेध कर दिया गया था। बहुधा राजा तथा सामन्तों का प्रोत्साहन पाकर विद्वान् पण्डित उनकी सभाओं की ओर आकर्षित होते थे और अधिकतर उनकी राजधानी में ही बस जाते थे, जिससे वे नगर शिक्षा के केन्द्र बन जाते थे। इनमें तक्षशिला, पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, मिथिला, धारा, तंजोर आदि प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार तीर्थ स्थानों की ओर भी विद्वान् आकृष्ट होते थे। फलत: काशी, कर्नाटक, नासिक आदि शिक्षा के प्रसिद्ध केन्द्र बन गये।

कभी-कभी राजा भी अनेक विद्वानों को आमंत्रित करके दान में भूमि आदि देकर तथा जीविका निश्चित करके उन्हें बसा लेते थे। उनके बसने से वहां एक नया गांव बन जाता था। इन गांवों को `अग्रहार’ कहते थे। इसके अतिरिक्त विभिन्न हिन्दू सम्प्रदायों एवं मठों के आचार्यों के प्रभाव से ईसा की दूसरी शताब्दी के लगभग मठ शिक्षा के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गये। इनमें शंकराचार्य, रामानुचार्य, मध्वाचार्य आदि के मठ प्रसिद्ध हैं। सार्वजनिक शिक्षण संस्थाएँ सर्वप्रथम बौद्ध विहारों में स्थापित हुई थीं। भगवान बुद्ध ने उपासकों की शिक्षा-दीक्षा पर अत्यधिक बल दिया। इस संस्थाओं में धार्मिक ग्रन्थों का अध्यापन एवं आध्यात्मिक अभ्यास कराया जाता था। अशोक (३०० ई। पू।) ने बौद्ध विहारों की विशेष उन्नति करायी। कुछ समय पश्चात् ये विद्या के महान केन्द्र बन गये। ये वस्तुत: गुरुकुलों के ही समान थे। किन्तु इनमें गुरु किसी एक कुल का प्रतिनिधि न होकर सारे विहार का ही प्रधान होता था। ये धर्म प्रचार की दृष्टि से जनसाधारण के लिए भी सुलभ थे। इनमें नालन्दा विश्वविद्यालय (४५० ई।), बलभी (७०० ई।), विक्रमशिला (८०० ई।) प्रमुख शिक्षण संस्थाएँ थीं।

नारियों के लिये पाठशालाएं

आलोच्य काल में नारियों के लिए किसी प्रकार की पाठशाला का पृथक्-प्रबन्ध किया गया हो ऐसा वर्णन प्राप्त नहीं होता। बौद्धों ने अपने विहारों में भिक्षुणियों की शिक्षा की व्यवस्था की थी किन्तु कालान्तर में उसके भी उदाहरण प्राप्त नहीं होते। वस्तुत: कन्याओं के लिए पृथक् पाठशालाएँ न थीं। जिन कन्याओं को गुरुकुल में अध्ययन करने का अवसर प्राप्त होता था वे पुरुषों के साथ ही अध्ययन करती थीं। उतररामचरित में बाल्मीकि के आश्रम में आत्रेयी अध्ययन कर रही थी। भवभूति ने `मालती माधव’ (प्रथमांक) में कामन्दकी के गुरुकुल में अध्ययन करने का वर्णन किया है। किन्तु ये उदाहरण बहुत कम हैं। अधिकतर गुरुपत्नी, गुरुकन्या अथवा गुरु की पुत्रवधू ही गुरुकुल में रहने के कारण अध्ययन का लाभ उठा पाती थीं वस्तुत: शास्त्रों के अनुरोध पर कन्याओं की शिक्षा गृह पर ही होती थी।

सह-शिक्षा एवं पृथक् शिक्षा विवेचन

उत्तररामचरित में बाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश के साथ पढ़ने वाली आत्रेयी नामक स्त्री का उल्लेख हुआ है। जो इस बात का पुष्ट प्रमाण है कि उस युग में सह-शिक्षा का प्रचार था। इसी प्रकार `मालती-माधव’ में भी भवभूति ने भूरिवसु एवं देवराट के साथ कामन्दकी नामक स्त्री के एक ही पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करने का वर्णन किया है। भवभूति आठवी शताब्दी के कवि हैं। अतएव ऐसा प्रतीत होता है कि यदि भवभूति के समय में नहीं तो उनसे कुछ समय पूर्व तक बालक-बालिकाओं की सह-शिक्षा का प्रचलन अवश्य रहा होगा। इसी प्रकार पुराणों में कहोद और सुजाता, रूहु और प्रमदवरा की कथाएं वर्णित हैं। इनसे ज्ञात होता है कि कन्याएं बालकों के साथ-साथ पाठशालाओं में पढ़ती थीं तथा उनका विवाह युवती हो जाने पर होता था। परिणामत: कभी-कभी गान्धर्व विवाह भी हो जाते थे। ये समस्त प्रमाण इस तथ्य पर प्रकाश डालते हैं कि उस युग में स्त्रियाँ बिना पर्दे के पुरुषों के बीच रह कर ज्ञान की प्राप्ति कर सकती थीं। उस युग में सहशिक्षा-प्रणाली का अस्तित्व भी इनसे सिद्ध होता है। गुरुकुलों में सहशिक्षा का प्रचार था, इस धारणा का समर्थन आश्वलायन गृह ससूत्र में वर् णित समावर्तन संस्कार की विधि से भी मिलता है। इस विधि में स्नातक के अनुलेपन क्रिया के वर्णन में बालक एवं बालिका का समार्वतन संस्कार साथ-साथ सम्पन्न होना पाया जाता है। उस युग में स्त्री के ब्रह्मचर्याश्रम, वेदाध्ययन तथा समावर्तन संस्कार का औचित्य आश्वलायन के मतानुसार प्रमाणित हो जाता है।

संयम का फल

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 मैं शत्रुओं से इतना नहीं चौंकता हूँ, जितना विकारों से चौंकता हूँ।”

गुजरात में भावनगर किला है। उस भावनगर का राजा भी जिससे काँपता था, ऐसा एक डाकू था जोगीदास खुमाण।

एक रात्रि को वह अपनी एकांत जगह पर सोया था। चाँदनी रात थी। करीब 11 बजने को थे। इतने में एक सुंदरी सोलह श्रृंगार से सजी-धजी वहाँ आ पहुँची। जोगीदास चौंककर खड़ा हो गया।

“खड़ी रहो। कौन हो ?”

वह युवती बाँहें पसारती हुई बोलीः “तेरी वीरता पर मैं मुग्ध हूँ। अगर सदा के लिए नहीं तो केवल एक रात्रि  के लिए ही मुझे अपनी भुजाओं में ले ले।”

गर्जता हुआ जोगीदास बोलाः “वहीं खड़ी रह। तू स्त्री है, यह मैं जानता हूँ। लेकिन मैं शत्रुओं से इतना नहीं डरता हूँ, जितना विकारों से चौंकता हूँ।”

युवतीः “मैंने मन से तुम्हें अपना पति मान लिया है।”

जोगीदासः “तुमने चाहे जो माना हो, मैं किसी गुरु की परम्परा से चला हूँ। मैं अपना सत्यानाश नहीं कर सकता। तुम जहाँ से आयी हो, वहीं लौट जाओ।’

वह युवती पुनः नाज-नखरे करने लगी, तब जोगीदास बोलाः “तुम मेरी बहन हो। मुझे इन विकारों में फँसाने की चेष्टा मत करो। चली जाओ।” समझा-बुझाकर उसे रवाना कर दिया।

तब से जोगीदास कभी अकेला नहीं सोया। अपने साथ दो अंगरक्षक रखने लगा। वह भी, कोई मार जाय इस भय से नहीं, वरन् कोई मेरा चरित्र भंग न कर जाय, इस भय से रखता था।

एक बार जोगीदास कहीं जा रहा था। गाँव के करीब खेत में एक ललना काम कर रही थी और प्रभातियाँ गाये जा रही थी। जोगीदास ने उस लड़की से पूछाः

“ऐसे सन्नाटे में तू अकेली काम कर रही है, तुझे तेरे शीलभंग (चरित्रभंग) का डर नहीं लगता ?”

तब उस युवती ने हँसिया सँभालते हुए, आँखे दिखाते हुए कड़क स्वर में कहाः “डर क्यों लगे ? जब तक हमारा भैया जोगीदास जीवित है, तब तक आसपास के पचास गाँवों की बहू-बेटियों को डर किस बात का।”

उस युवती को पता नहीं था कि यही जोगीदास है। जोगीदास को आत्मसंतोष हुआ कि ‘पचास गाँवों की बहू-बेटियों को तसल्ली है कि हमारा भैया जोगीदास है।’

डाकुओं में भी संयम होता है तो इस सदगुण के कारण वे इतने स्नेहपात्र हो सकते हैं तो फिर सज्जन का संयम उसे उसके लक्ष्य परमेश्वर से भी मिलाने में सहायक हो जाये, इसमें क्या आश्चर्य! सिंह जैसा बल भर देता है ब्रह्मचर्य का पालन। कुप्रसिद्ध को सुप्रसिद्ध कर देता है ब्रह्मचर्य का पालन। सदाचार, सदविचार और यौवन की सुरक्षा करता है ब्रह्मचर्य का पालन।

विद्यार्थी के योग्यता को बढ़ाने के उपाय

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विद्यार्थीयों में  प्राणायाम, योगासन, यौगिक प्रयोगों व प्रेरणादायी प्रसंगों के द्वारा नैतिक, चारित्रिक, मानसिक व बौद्धिक उन्नति करनेवाले जीवनमुल्यों व दिव्य संस्कारों का सिंचन किया गया ।

विद्यार्थिओं के जीवन को उज्जवल बनाने में सहायक कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निचे दिए जा रहे है !

  1. सबसे विनयपूर्वक मीठी वाणी से बोलना |

  2. किसीकीचुगली या निंदा नहीं करना |

  3. किसीके सामने किसी भी दुसरे की कही हुई ऐसी बात को न कहना, जिससे सुननेवाले के मन में उसके प्रति द्वेष या दुर्भाव पैदा हो या बड़े |

  4. जिससे किसीके प्रति सदभाव तथा प्रेम बढ़े, द्वेष हो तो मिट जाये या घट जाये, ऐसी ही उसकी बात किसीके सामने कहना |

  5. किसीको ऐसी बात कभी न कहना जिससे उसका जी दुःखे |

  6. बिना कार्य ज़्यादा न बोलना, किसीके बीच में न बोलना, बिना पूछे अभिमानपूर्वक सलाह न देना, ताना न मरना, शाप न देना | अपनेको भी बुरा-भाला न कहना, गुस्से में आ कर अपनेको भी शाप न देना, न सिर पीटना |

  7. जहाँ तक हो परचर्चा न करना, जगचर्चा न करना | आए हुए का आदर-सत्कार करना, विनय-सम्मान के साथ हँसते हुए बोलना |

  8. किसीके दुःख के समय सहानुभूतिपूर्ण वाणी से बोलना | हँसना नहीं | किसीको कभी चिढ़ाना नहीं |अभिमानवश घरवालों को या कभी किसीकोमूर्ख, मंदबुद्धि, नीच वृत्तिवाला तथा अपने से नीचा न मानना, सच्चे हृदय से सबका सम्मान व हित करना | मन में अभिमान तथा दुर्भाव न रखना, वाणी से कभी कठोर तथा निंदनीय शब्दों का उच्चारण न करना | सदा मधुर विनाम्रतायुक्त वचन बोलना | मूर्ख को भी मूर्ख कहकर उसे दुःख न देना |

  9. किसीकाअहित हो ऐसी बात न सोचना, न कहना और न कभी करना | ऐसी ही बात सोचना, कहना और करना जिससे किसीका हित हो |

  10. धन, जन, विद्या, जाति, उम्र, रूप, स्वास्थ्य, बुद्धि आदि का कभी अभिमान न करना |

  11. भाव से, वाणी से, इशारे से भी कभी किसीका अपमान न करना, किसीकी खिल्ली न उड़ना |

  12. दिल्लगी न करना, मुँह से गन्दी तथा कड़वी जबान कभी न निकालना | आपस में द्वेष बढ़े, ऐसी सलाह कभी किसीको भी न देना | द्वेष की आग में आहुति न देकर प्रेम बढे ऐसा अमृत ही सींचना |

  13. फैशन के वश में न होना | कपडे साफ-सुथरे पहनना परन्तु फैशन के लिए नहीं |

  14. घर की चीजों को संभालकर रखना | इधर-उधर न फेंकना | घर की चीजों की गिनती रखना |अपना काम जहाँ तक हो सके स्वयं ही करना |अपना काम आप करने में तो कभी लज्जाना ही, बल्कि जो काम नौकरों से या दूसरों से कराये बिना अपने करने से हो सकता है उस काम को स्वयं ही करना | काम करने में उत्साही रहना | काम करने की आदत न छोड़ना |

  15. किसी का कभी अपमान न करना | तिरस्कारयुक्त बोली न बोलना |

 

राष्ट्रभाषाः देश का स्वाभिमान,

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भारतीय सभ्यता में विभिन्नताओं के बावजूद हमारा आचार-विचार, व्यवहार सभी एक मूल धारा से जुड़ा है और उसी का नाम है संस्कृति, जिसकी संहिता है संस्कृत भाषा में। देश की तमाम भाषाएँ संस्कृत भाषा कि पुत्रियाँ मानी जाती हैं, जिनमें पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोये रखने का महान कार्य करने वाली ज्येष्ठ पुत्री है हमारी राष्ट्रभाषा ʹहिन्दीʹ। देश की अन्य भाषाएँ उसकी सहयोगी बहने हैं, जो एकता में अनेकता व अनेकता में एकता का आदर्श प्रस्तुत करती हैं। प्राचीन काल में संस्कृत भाषा के विशाल साहित्य के माध्यम से जीवन-निर्माण की नींव रखी गयी थी। उसी से प्रेरित और उसी का युग-अनुरूप सुविकसित मधुर फल है राष्ट्रभाषा हिन्दी का साहित्य। आज भी इस विशाल साहित्य के माध्यम से नीतिमत्ता के निर्देश, ईश्वर के आदेश, ऋषियों के आदेश, ऋषियों के उपदेश और महापुरुषों के संदेश हमारे जीवन की बगिया को सुविकसित करते हुए महकता उपवन बना रहे हैं।
अंग्रेजी शासन से पूर्व हमारे देश में सभी कार्य हिन्दी में किये जाते थे। मैकाले की शिक्षा-पद्धति विद्यालयों में आयी और विद्यार्थियों को अंग्रेजी में पढ़ाया जाने लगा, उसी में भावों को अभिव्यक्त करने के लिए मजबूर किया जाने लगा। हिन्दी को केवल एक भाषा विषय की जंजीरों में बाँध दिया गया, जिसके दुष्परिणाम सामने हैं।
अंग्रेजी भाषा के दुष्परिणाम
गांधी जी कहते थेः “विदेशी भाषा के माध्यम ने बच्चों के दिमाग को शिथिल कर दिया है। उनके स्नायुओं पर अनावश्यक जोर डाला है, उन्हें रट्टू और नकलची बना दिया है तथा मौलिक कार्यों और विचारों के लिए सर्वथा अयोग्य बना दिया है। इसकी वजह से वे अपनी शिक्षा का सार अपने परिवार के लोगों तथा आम जनता तक पहुँचाने में असमर्थ हो गये हैं। यह वर्तमान शिक्षा प्रणाली का सबसे बड़ा करूण पहलू है। विदेशी माध्यम ने हमारी भाषाओँ की प्रगति और विकास को रोक दिया है। कोई भी देश नकलचियों की जाति पैदा करके राष्ट्र नहीं बन सकता।”
लौहपुरुष सरदार पटेल कहा कहते थेः “विदेशी भाषा के माध्यम द्वारा शिक्षा देने के तरीके से हमारे युवकों की बुद्धि के विकास में बड़ी कठिनाई पैदा होती है। उनका बहुत-सा समय उस भाषा को सीखने में ही चला जाता है और इतने समय के बावजूद यह कहना कठिन होता है कि उन्हें शब्दों का ठीक-ठाक अर्थ कितना आ गया।”
भ्रांतियों से सत्यता की ओर…..
मैकाले की शिक्षा पद्धति के गुलाम आज के व्यक्तियों द्वारा हमारी भोली-भाली युवा पीढ़ी को भ्रमित करने के लिए अंग्रेजी के पक्ष में कई तर्क दिये जाते हैं, जिनका सच्चाई से कोई संबंध नहीं होता। जैसे – वे कहते हैं कि ʹअंग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है।ʹ परंतु किसी भी भाषा की समृद्धि इस बात से तय होती है कि उसमें कितने मूल शब्द हैं। अंग्रेजी में सिर्फ 12000 मूल शब्द हैं। बाकी के सारे शब्द चोरी के हैं अर्थात् लैटिन, फ्रैंच, ग्रीक भाषाओं के हैं। इस भाषा की गरीबी तो इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाती है कि अंग्रेजी में चाचा, मामा, फूफा, ताऊ सबको ʹअंकलʹ और चाची, मामी, बुआ, ताई सबको ʹआँटीʹ कहते हैं। जबकि हिन्दी में 70000 मूल शब्द हैं। इस प्रकार भाषा के क्षेत्र में अंग्रेजी कंगाल है।
मैकाले की शिक्षा पद्धति कहती  हैं कि ʹअंग्रेजी नहीं होगी तो विज्ञान व तकनीक की पढ़ाई नहीं हो सकतीʹ परंतु जापान एवं फ्रांस में विज्ञान व तकनीक की पढ़ाई बिना अंग्रेजी के बड़ी उच्चतर रीति से पढ़ायी जाती है। पूरे जापान में इंजीनियरिंग तथा चिकित्सा के जितने भी महाविद्यालय व विश्वविद्यालय हैं, सबमें जापानी भाषा में पढ़ाई होती है। जापान के लोग विदेश भी जाते हैं तो आपस में जापानी में ही बात करते हैं। जापान ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी भाषा में ही अध्ययन करके उन्नति की है, जिसका लोहा पूरा विश्व मानता है। इसी तरह फ्रांस में बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक पूरी शिक्षा फ्रेंच भाषा में दी जाती है।
इसके विपरीत हमारे देश में अंग्रेजी भाषा के प्रशिक्षण को राष्ट्रीय एवं राजकीय कोषों से आर्थिक सहायता द्वारा प्रोत्साहन दिया जा रहा है। संसद, न्यायपालिका आदि महत्त्वपूर्ण प्रणालियों में भी अंग्रेजी को प्रधानता मिल रही है। इससे केवल उच्च वर्ग ही इनका लाभ ले पा रहा है। ʹअंग्रेजी युवा पीढ़ी की माँग हैʹ – ऐसा बहाना बनाकर विज्ञापनों के माध्यम से भाषा की तोड़-मरोड़ करके अपनी ही राष्ट्रभाषा का घोर तिरस्कार किया जा रहा है। उसका सुंदर, विशुद्ध स्वरूप विकृत कर उसमें अंग्रेजी के शब्दों की मिलावट करके टीवी धारावाहिकों, चलचित्रों आदि के माध्यम से सबको सम्मोहित किया जा रहा है।
अंग्रेजी का दुष्परिणाम  इतना बढ़ गया है कि बच्चों के लिए अपनी माँ को ʹमाता श्रीʹ कहना तो दूर ʹमाँʹ कहना भी दूभर होता जा रहा है। जिस भाषा में वात्सल्यमयी माँ को ʹमम्मीʹ (मसाला लगाकर रखी हुई लाश) और जीवित पिता को ʹडैडीʹ (डेड यानी मुर्दा) कहना सिखाया जाता है, उसी भाषा को बढ़ावा देने के लिए हमारे संस्कार प्रधान देश की जनता के खून-पसीने की कमाई को खर्च किया जाना कहाँ तक उचित है ?
बुराई का तुरन्त इलाज होना चाहिए
गांधी जी कहते थेः “अंग्रेजी सीखने के लिए हमारा जो विचारहीन मोह है, उससे खुद मुक्त होकर और समाज को मुक्त करके हम भारतीय जनता की एक बड़ी-से-बड़ी सेवा कर सकते हैं। अगर मेरे हाथों में तानाशाही सत्ता हो तो मैं आज से ही विदेशी माध्यम के जरिये दी जाने वाली शिक्षा बंद कर दूँ और सारे शिक्षकों व प्राध्यापकों से यह माध्यम तुरंत बदलवा दूँ या उन्हें बरखास्त करा दूँ। मैं पाठ्यपुस्तकों की तैयारी का इंतजार नहीं करूँगा। वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे-पीछे अपने-आप चली आयेंगी। यह एक ऐसी बुराई है, जिसका तुरंत इलाज होना चाहिए।”
मातृभाषा हो शिक्षा का माध्यम
बच्चा जिस परिवेश में पलता है, जिस भाषा को सुनता है, जिसमें बोलना सीखता है उसके उसका घनिष्ठ संबंध व अपनत्व हो जाता है। और यदि वही भाषा उसकी शिक्षा का माध्यम बनती है तो वह विद्यालय में आत्मीयता का अनुभव करने लगता है। उसे किसी भी विषय को समझने के लिए अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती। दूसरी भाषा को सीखने-समझने में लगने वाला समय उसका बच जाता है। इस विषय़ में गांधी जी कहते हैं- “राष्ट्रीयता टिकाये रखने के लिए किसी भी देश के बच्चों को नीची या ऊँची – सारी शिक्षा उनकी मातृभाषा के जरिये ही मिलनी चाहिए। यह स्वयं सिद्ध बात है कि जब तक किसी देश के नौजवान ऐसी भाषा में शिक्षा पाकर उसे पचा न लें जिसे प्रजा समझ सके, तब तक वे अपने देश की जनता के साथ न तो जीता-जागता संबंध पैदा कर सकते हैं और न उसे कायम रख सकते हैं।
हमारी पहली और बड़ी-से-बड़ी समाजसेवा यह होगी की हम अपनी प्रांतीय भाषाओं का उपयोग शुरु करें और हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में उसका स्वाभाविक स्थान दें। प्रांतीय कामकाज प्रांतीय भाषाओं में करें और राष्टीय कामकाज हिन्दी में करें। जब तक हमारे विद्यालय और महाविद्यालय प्रांतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षण देना शुरु नहीं करते, तब तक हमें इस दिशा में लगातार कोशिश करनी चाहिए।”
तो आइये, हम सब भी गांधी जी की चाह में अपना सहयोग प्रदान करें। हे देशप्रेमियो ! अपनी मातृभाषा एवं राष्ट्रभाषा का विशुद्ध रूप से प्रयोग करें और करने के लिए दूसरों को प्रोत्साहित करें। हे आज के स्वतंत्रता-संग्रामियो ! अब देश को अंग्रेजी की मानसिक गुलामी से भी मुक्त कीजिये। क्रान्तिवीरो ! पूरे देश में अपनी इन भाषाओं में ही शिक्षा और कामकाज की माँग बुलन्द कीजिये। आपके व्यक्तिगत एवं संगठित सुप्रयास शीघ्र ही रंग लायेंगे और सिद्ध कर देंगे कि हमें अपने देश से प्रेम है।

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