विद्यार्थी और ब्रह्मचर्य

 

swami-vivekananda-hd-wallpapers-free

“यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है।”

विद्यार्थी काल शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक विकास का समय है और इस विकास का मुख्य आधार है वीर्यरक्षा ! विद्यार्थी को अपने अध्ययन और प्रवृत्ति  लिए उत्साह, बुद्धिशक्ति, स्मृतिशक्ति, एकाग्रता, संकल्पबल आदि गुणों के विकास की बहुत आवश्यकता होती है। इन सबमें वीर्यरक्षा द्वारा बहुत प्रगति प्राप्त की जा सकती है। इसके विपरीत वीर्यनाश से तन और मन को बहुत नुकसान होता है। वीर्यनाश से निर्बलता, रोग, आलस्य, चंचलता, निराशा और पलायनवादिता के दुर्गुण आ धमकते हैं। इस दुष्प्रवृत्ति का शिकार विद्यार्थी अपने विकासकाल के अति महत्त्वपूर्ण समय को गँवा बैठता है।

विद्यार्थीकाल जीवनरूपी इमारत को बनाने के लिए नींव का पत्थर है। क्या विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है ? यह प्रश्न ऐसा ही है, जैसे कोई पूछेः ‘क्या इमारत के लिए मजबूत नींव की जरूरत है ? मछली को पानी की आवश्यकता है ?’

जीवन में दो विरोधियों को साथ में रखना यह प्रकृति का नियम है। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विवेक होना जरूरी है। विद्यार्थीकाल में जहाँ एक ओर जगत को कँपाने में सक्षम, चाहे जो करने में समर्थ ऐसी प्रचंड वीर्यशक्ति और मौका प्रकृति युवान को देती है, वहीं दूसरी ओर उसके यौवन को लूट लेने वाली विजातीय आकर्षण की सृष्टि भी उसके सामने आ खड़ी होती है।

जिस देश के युवक गुरुकुलों में रहकर 25 वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करके चक्रवर्ती सम्राट, वीर योद्धा आदि बन कर असम्भव जैसे कार्य भी सहज ही कर लेते थे, उसी देश के निस्तेज युवक अपने परिवार को और खुद को भी नहीं सँभाल पाते यह कैसा दुर्भाग्य है। गोलियाँ बरसा के खुद को और अपने परिवार को अकाल मौत के घाट उतार देते हैं।

युवा पीढ़ी को निस्तेज बनाने वाले सेक्सोलॉजिस्टों एवं अखबारों को डॉ निकोलस के इस कथन को पढ़कर अपनी बुद्धि का सुधार करना चाहिए।

डॉ. निकोलस कहते हैं- “वीर्य को पानी की तरह बहाने वाले आजकल के अविवेकी युवाओं के शरीर को भयंकर रोग इस प्रकार घेर लेते हैं कि डॉक्टर की शरण में जाने पर भी उनका उद्धार नहीं होता। अंत में बड़ी कठिन विपत्तियों का सामना करने के बाद असमय ही उन अभागों का महाविनाश हो जाता है।”

यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है, खिलते फूल-सदृश विद्यार्थी-जीवन को निचोड़कर नरकतुल्य बना सकती है। अतः सावधान !

GovtsrStudents-2 GovtsrStudents-3

Advertisements

विद्यार्थी के योग्यता को बढ़ाने के उपाय

Vidyapeeth-4Vidyapeeth-8

विद्यार्थीयों में  प्राणायाम, योगासन, यौगिक प्रयोगों व प्रेरणादायी प्रसंगों के द्वारा नैतिक, चारित्रिक, मानसिक व बौद्धिक उन्नति करनेवाले जीवनमुल्यों व दिव्य संस्कारों का सिंचन किया गया ।

विद्यार्थिओं के जीवन को उज्जवल बनाने में सहायक कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निचे दिए जा रहे है !

  1. सबसे विनयपूर्वक मीठी वाणी से बोलना |

  2. किसीकीचुगली या निंदा नहीं करना |

  3. किसीके सामने किसी भी दुसरे की कही हुई ऐसी बात को न कहना, जिससे सुननेवाले के मन में उसके प्रति द्वेष या दुर्भाव पैदा हो या बड़े |

  4. जिससे किसीके प्रति सदभाव तथा प्रेम बढ़े, द्वेष हो तो मिट जाये या घट जाये, ऐसी ही उसकी बात किसीके सामने कहना |

  5. किसीको ऐसी बात कभी न कहना जिससे उसका जी दुःखे |

  6. बिना कार्य ज़्यादा न बोलना, किसीके बीच में न बोलना, बिना पूछे अभिमानपूर्वक सलाह न देना, ताना न मरना, शाप न देना | अपनेको भी बुरा-भाला न कहना, गुस्से में आ कर अपनेको भी शाप न देना, न सिर पीटना |

  7. जहाँ तक हो परचर्चा न करना, जगचर्चा न करना | आए हुए का आदर-सत्कार करना, विनय-सम्मान के साथ हँसते हुए बोलना |

  8. किसीके दुःख के समय सहानुभूतिपूर्ण वाणी से बोलना | हँसना नहीं | किसीको कभी चिढ़ाना नहीं |अभिमानवश घरवालों को या कभी किसीकोमूर्ख, मंदबुद्धि, नीच वृत्तिवाला तथा अपने से नीचा न मानना, सच्चे हृदय से सबका सम्मान व हित करना | मन में अभिमान तथा दुर्भाव न रखना, वाणी से कभी कठोर तथा निंदनीय शब्दों का उच्चारण न करना | सदा मधुर विनाम्रतायुक्त वचन बोलना | मूर्ख को भी मूर्ख कहकर उसे दुःख न देना |

  9. किसीकाअहित हो ऐसी बात न सोचना, न कहना और न कभी करना | ऐसी ही बात सोचना, कहना और करना जिससे किसीका हित हो |

  10. धन, जन, विद्या, जाति, उम्र, रूप, स्वास्थ्य, बुद्धि आदि का कभी अभिमान न करना |

  11. भाव से, वाणी से, इशारे से भी कभी किसीका अपमान न करना, किसीकी खिल्ली न उड़ना |

  12. दिल्लगी न करना, मुँह से गन्दी तथा कड़वी जबान कभी न निकालना | आपस में द्वेष बढ़े, ऐसी सलाह कभी किसीको भी न देना | द्वेष की आग में आहुति न देकर प्रेम बढे ऐसा अमृत ही सींचना |

  13. फैशन के वश में न होना | कपडे साफ-सुथरे पहनना परन्तु फैशन के लिए नहीं |

  14. घर की चीजों को संभालकर रखना | इधर-उधर न फेंकना | घर की चीजों की गिनती रखना |अपना काम जहाँ तक हो सके स्वयं ही करना |अपना काम आप करने में तो कभी लज्जाना ही, बल्कि जो काम नौकरों से या दूसरों से कराये बिना अपने करने से हो सकता है उस काम को स्वयं ही करना | काम करने में उत्साही रहना | काम करने की आदत न छोड़ना |

  15. किसी का कभी अपमान न करना | तिरस्कारयुक्त बोली न बोलना |