भारतीय शिक्षा पद्धति

vidyarthi vikas sansthan

  आधार मानव में अंतर्निहित जिज्ञासा की मूल प्रवृत्ति ने सीखने की प्रवृत्ति को जन्म दिया। शैशवावस्था से वृद्धावस्था तक सीखने की यह प्रवृत्ति जीवित रहती है। समय के साथ सीखने के साधन और स्तर बदलते रहते हैं। सीखने की इस प्रवृत्ति को व्यवस्थित करने के लिये शिक्षा की आवश्यकता बनी।

शिक्षा को व्यवस्थित रूप देने के क्रम में दो प्रश्न उभरे। प्रथम ‘क्या’ सिखाया जाए तथा द्वितीय ‘कैसे’ सिखाया जाए? क्या के अन्तर्गत उन विषयों का समावेश हुआ जिनके ज्ञान से मानव समाज में उपयोगी (उत्पादक) भूमिका निभाने में सक्षम हो सके तथा उत्पादक प्रतिभा के सदुपयोग के लिये आवश्यक मानवीय चरित्र का विकास हो। अर्थात् पेशेगत कौशल की शिक्षा तथा चरित्र की शिक्षा। कैसे? का समाधान शिक्षा को गुरु या शिक्षक (अध्यापक) से जोड़कर किया गया। समय के साथ सीखने के विषय तो बदलते रहे पर गुरु या शिक्षक का महत्व नहीं बदला।

व्यक्ति के रूप में मानव की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। व्यक्ति की स्वस्थता पर ही परिवार का सुख, समाज की समृद्धि तथा देश की शान्ति आधारित है। व्यक्ति की स्वस्थता ‘शिक्षा’ पर आश्रित है। अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति का निर्माण शिक्षा का मौलिक लक्ष्य है। स्वस्थ व्यक्ति का अर्थ है, विवेक से युक्त ज्ञान सम्पन्न बुद्धि, विनम्रता से युक्त कर्मठ मन, रोग रहित श्रमशील शरीर। बुद्धि के विवेक से युक्त होने पर मानवीय चरित्र तथा द्वन्द्व रहित निर्णय की क्षमता प्राप्त होती है। ‘ज्ञान’ से मानव को उपयोगी भूमिका निभाने की योग्यता प्राप्त होती है।

विनम्रता से मानव-मानव के बीच सम्बन्धों की मर्यादा का संरक्षण तथा कर्मठता से आर्थिक समृद्धि का द्वार खुलता है। रोग रहित श्रम शील शरीर, बौद्धिक तथा मानसिक प्रेरणाओं को अभिव्यक्त करने में सक्षम होता है। इस प्रकार शिक्षा पर यह दायित्व है कि व्यक्ति के बुद्धि को विवेक से जोड़कर ज्ञान सम्पन्न बनाये। मन में कर्म के प्रति विश्वास और विनम्रता जगाए। और शरीर को स्वस्थ रखने के लिये सन्तुलित आहार तथा श्रम के महत्व को समझाए। अर्थात शिक्षा का मूल प्रयोजन मानव के तीनों आयामों बुद्धि, मन तथा शरीर को स्वस्थ बनाकर उसे सुसभ्य, सुसंस्कृत तथा विकासोन्मुख बनाना है।

गुरु, शिक्षक या अध्यापक शिक्षा का केन्द्र है। ज्ञान के हर विधा की शिक्षा में गुरु की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कोई पढ़कर जितना भी जान ले, पर समझने एवं कार्य रूप में परिणत करने के लिये गुरु की आवश्यकता अपरिहार्य है। कहावत है- ‘करता उस्ताद ना कर्ता शागिर्द’। अर्थात जो ज्ञान की अपनी धरा को कार्य रूप में परिणत करने की योग्यता रखता हो वह गुरु तथा ऐसी योग्यता को पाने की इच्छा रखने वाले शिष्य है।

गुरु व्यक्ति नहीं वरन् गरिमामय पद है। इस पद पर शैशवावस्था से वृद्धावस्था तक अलग-अलग लोग बैठते हैं। सर्वप्रथम इस पद पर ‘मां’ बैठती है। मां से ही बच्चे को पिता एवं अन्य सम्बन्धों का ज्ञान प्राप्त होता है। माता-पिता एवं परिवार से (पांच वर्ष की आयु तक) बोलने, वस्तुओं, अंगों तथा सम्बन्धों को पहचानने का ज्ञान प्राप्त होता है। इसके बाद आचार्य से योग्यता (उत्पादक भूमिका के लिये) का ज्ञान, विवाहित होने पर समाज से दायित्व का ज्ञान, राज्य या राष्ट्र से कर्तव्य का ज्ञान तथा विश्व से अपने वास्तविक स्वरूप (आत्म-बोध) का ज्ञान प्राप्त होना चाहिए। मानव जीवन के हर स्तर पर ज्ञानार्जन के केन्द्र में ‘गुरु’ अवस्थित है।

विश्व की पहचान ‘सन्त’ के माध्यम से, राज्य की राष्ट्र की पहचान ‘राजा’ के माध्य़म से, समाज की पहचान कर्म के माध्यम से तथा सम्बन्धों की पहचान परिवार के माध्यम से तथा योग्यता की पहचान ‘गुरु’ के माध्यम से होती है। ज्ञानार्जन की जिज्ञासा मानव में सृष्टि के आदिकाल से ही दिखाई देती है। इस ज्ञान पिपासा ने वृहद् वैदिक वार्घैंमय को जन्म दिया। इसके अन्तर्गत चार वेद, चार उपवेद, षट्शास्त्र, षट्दर्शन, अट्ठारह पुराण, रामायण, महाभारत आदि आते हैं। इनमें मानव के लिये आवश्यक सभी धाराओं के ज्ञान का संग्रह है। सहस्त्राब्दियों तक इस ज्ञान के अनुकरण से ही ‘भारत’ सोने की चिड़िया बना तथा हर क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास किया।

इस समय हमारे देश में एक ऐसा वर्ग है जिसकी भ्रमपूर्ण सोच के अनुसार अंग्रेजों के आने से पहले देश में शिक्षा का कोई स्वरूप नहीं था तथा देशवासी असभ्य, गंवार और अशिक्षित थे। अपने लगभग दो शताब्दियों के शासनकाल में उन्होंने हमें सुसभ्य और शिक्षित बनाया। यहां इस तथ्य को क्यों नजरअन्दाज किया जाता है कि असभ्य, गंवार और अशिक्षित लोगों से कोई समाज या राष्ट्र ‘सोने की चिड़िया’ नहीं बन सकता। यदि अतीत में सब कुछ बुरा और बिगड़ा था तो साहित्य, संगीत, कला (शिल्प), दर्शन, खगोल आदि क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कैसे हुई?

वैदिक वांर्घैंमय का विशाल ज्ञान भण्डार, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से सम्प्रेषित होता रहा तथा आज भी इसका पूर्णतया लोप नहीं हुआ है। इस सन्दर्भ में आरोप लगता है कि ऐसी शिक्षा मात्र उच्च वर्ण को उपलब्ध थी तथा शूद्र इससे वंचित थे। इस बारे में यहां मेरे एक व्यक्तिगत संस्मरण का उल्लेख आवश्यक लगता है। लगभग पैंतीस वर्ष पूर्व, उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के एक गांव में ठहरा था। वहां ‘बांठे’ नाम के एक मध्यम आयु के हरिजन (चमार) ने मुझे ढोलक की थाप पर अपने सुरीले स्वर में स्थानीय लोक-भाषा में सम्पूर्ण रामायण गाकर सुनाई थी। इससे यह स्पष्ट है कि ज्ञान, उच्च वर्ण तक सीमित नहीं था, वरन् अन्य वर्णों को भी वह सुलभ था।

समाज के हर स्तर पर ज्ञान का सम्प्रेषण श्रुति (श्रवण) परम्परा के माध्यम से बहुत समय तक होता रहा। लोग भले पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे पर उनमें कृषि, शिल्प, वास्तु आदि का ज्ञान भरपूर था। परम्परागत शिक्षा में सुनना, समझना तथा करने का प्रयास शिष्य का कर्तव्य तथा सुनाना, समझाना तथा करके दिखाना गुरु का कर्तव्य था। शिक्षा में लिखने-पढ़ने का प्रयोग महाभारत काल में (लगभग पांच हजार वर्ष) हुआ। उस समय महर्षि वेदव्यास जी ने भविष्य में श्रुति परम्परा का लोप देखकर, सम्पूर्ण वैदिक वार्घैंमय को लिपिबद्ध किया और कराया। अवश्य ही लिखने-पढ़ने से जुड़ी यह शिक्षा उच्च-वर्ण तक सीमित थी। परन्तु लोक-भाषा, लोक-कला, लोकगीत संगीत, लोक-नृत्य तथा लोक साहित्य के माध्यम से ज्ञान का सम्प्रेषण चलता ही रहा। आज भी ज्ञान सम्प्रेषण की इन विधाओं का बहुत बड़ा भाग अलिखित और अपठित है। मात्र श्रवण-परम्परा के माध्यम ये इन सभी विधाओं का आज भी अस्तित्व बना हुआ है।

परम्परागत शिक्षा में गुरु-शिष्य का सम्बन्ध अत्यन्त संवेदनशील तथा आत्मीय था। शिष्य के प्रति स्नेह गुरु का तथा गुरु के प्रति श्रद्धा शिष्य का आवश्यक गुण था। क्योंकि, गुरु से जीवन को सफल एवं विकासोन्मुख बनाने का ज्ञान मिलता था। ज्ञानार्जन के लिए गुरु-शिष्य के बीच किसी अन्य की कोई भूमिका नहीं थी। शिष्य सीधे गुरु से मिलकर ज्ञान की याचना कर सकता था तथा गुरु, शिष्य की जिज्ञासा तथा योग्यता को परखकर उसे स्वीकार करते थे। इसीलिये अतीत में ज्ञान के हर क्षेत्र में शिष्य की पहचान गुरु के माध्यम से होती थी। भले ही विश्वविद्यालय थे पर प्रवेश के लिये गुरु की स्वीकृति सर्वोपरि थी। गुरु के सन्दर्भ में यह आरोप भी लगता है कि यह गरिमामय पद मात्र ब्राह्मणों के लिये सुरक्षित था।

किन्तु वास्तविकता कुछ भिन्न है। ब्राह्मण वैदिक ज्ञान राशि के भंडार थे तथा उसी के शिक्षक होने के अधिकारी थे। ज्ञान की अन्य लौकिक धारायें

जैसे- शिल्प, वास्तु, संगीत, नृत्य, कला आदि पर कभी ब्राह्मणों का एकाधिकार नहीं रहा। इन क्षेत्रों में अन्य वर्णों के लोग भी गुरु के गरिमामय पद पर बैठने के अधिकारी थे। आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में तो शूद्रों को भी गुरु के आसन पर बैठने का पर्याप्त अवसर मिला। पिछले एक हजार वर्ष के इतिहास में सबसे अधिक संख्या शूद्र सन्तों की रही जिनको तत्कालीन समाज के सभी वर्णों से मान्यता मिली तथा भरपूर सम्मान भी। मीरा बाई क्षत्राणी थी और शिष्य बनी सन्त रविदास की। सन्त कबीर जुलाहे थे और बहुत सारे ब्राह्मण-क्षत्रियों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया।

शिक्षा व्यवस्था पर दोहरा दायित्व होता है। प्रथम मानव को ऐसा ज्ञान प्रदान करना जिससे मानव के रूप में वह अपनी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वाह कर सके तथा द्वितीय ऐसा ज्ञान भी प्रदान करे जिससे वह समाज में उत्पादक भूमिका का निर्वाह कर परिवार का भरण-पोषण कर सके। चूंकि पारम्परिक समाज में कर्म का अधिकार, वर्ण के अधिकार पर सुरक्षित था इसलिये उत्पादक भूमिका के निर्वाह की योग्यता पिता के माध्यम से हर व्यक्ति को मिल जाती थी। दूसरी ओर मानव को मानव बनाने की शिक्षा सन्तों, आचार्यों, विद्वानों तथा परिवार-समाज के बड़े बुजुर्गों से मिल जाती थी। अंग्रेजों के आगमन के पूर्व तक भारतीय समाज में शिक्षा के इस पारम्परिक स्वरूप में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ।

वर्ण-व्यवस्था में मानव के कर्म का निर्णय वर्ण के आधार पर हुआ। हर व्यक्ति अपने वर्णानुसार कर्म करने के लिये जन्म से अधिकृत हुआ। इस व्यवस्था में कभी बेकारी की समस्या जन्म नहीं लेती। वर्णानुसार कर्म का अधिकार तथा योग्यतानुसार कर्म का अवसर, वर्ण व्यवस्था की विशेषता बनी। यदि कोई शूद्र पहलवान, संगीतकार, प्रबन्धक आदि बनने की योग्यता रखता तो विकल्प खुले हुए थे। क्योंकि, भारतीय समाज में कर्म के अनुसार जातियां तो थीं। पर जातिवाद नहीं था। जातिवाद का जन्म अंग्रेजों की कुटिल राजनीति के कारण हुआ।

वर्ण-व्यवस्था में शिक्षा प्रायोगिक थी। इसमें लिखने-पढ़ने की आवश्यकता कम और समझने-करने की अधिक थी। पेशेगत योग्यता तो परिवार से मिल जाती थी। पर अन्य क्षेत्रों जैसे नृत्य-संगीत, शिल्प, वास्तु आदि में निपुणता के लिए तद्-तद् विषयों के गुरुओं के शिष्य बनकर शिक्षा लेनी पड़ती थी।

वर्ण व्यवस्था में शिक्षा की एक और विशेषता थी। इसमें हर व्यक्ति के अन्त:करण में अपने वर्णाश्रित कर्म के प्रति श्रद्धा एवं गर्व का भाव विकसित होता था। अर्थात् हर वर्ण का नागरिक अपने कर्म को आदरणीय एवं श्रेष्ठ समझता था। इसमें कर्म, मात्र उदरपूर्ति का माध्यम ही नहीं था वरन् आध्यात्मिक उन्नति का साधन भी था।

उपरोक्त विश्लेषण का यह निष्कर्ष निकला कि भारतीय शिक्षा में गुरु का स्थान सर्वोपरि था।

गुरु-शिष्य के बीच आत्मीय एवं भावनात्मक सम्बन्ध था। किसी भी विद्या की शिक्षा के लिये कोई निर्धारित शुल्क नहीं था। शिष्य गुरु-दक्षिणा अपनी सामर्थ्य के अनुसार देते थे। मानवीय चरित्र का विकास शिक्षा का प्रमुख प्रयोजन था। वर्णाश्रित कर्म के प्रति श्रद्धा, शिक्षा का प्रेरक तत्व था। विद्यार्थी जीवन में सात्विक आहार (शाकाहारी) अनिवार्य था।

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प्राचीन भारतीय शिक्षा

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गुरुकुलों की स्थापना प्राय: वनों, उपवनों तथा ग्रामों या नगरों में की जाती थी। वनों में गुरुकुल बहुत कम होते थे। अधिकतर दार्शनिक आचार्य निर्जनवनों में निवास, अध्ययन तथा चिन्तन पसन्द करते थे। बाल्मीकि, सन्दीपनि, कण्व आदि ऋषियों के आश्रम वनों में ही स्थित थे और इनके यहाँ दर्शन शास्त्रों के साथ-साथ व्याकरण, ज्योतिष तथा नागरिक शास्त्र भी पढ़ाये जाते थे। अधिकांश गुरुकुल गांवों या नगरों के समीप किसी वाग अथवा वाटिला में बनाये जाते थे। जिससे उन्हें एकान्त एवं पवित्र वातावरण प्राप्त हो सके। इससे दो लाभ थे; एक तो गृहस्थ आचार्यों को सामग्री एकत्रित करने में सुविधा थी, दूसरे ब्रह्मचारियों को भिक्षाटन में अधिक भटकना नहीं पड़ता था। मनु के अनुसार `ब्रह्मचारों को गुरु के कुल में, अपनी जाति वालों में तथा कुल बान्धवों के यहां से भिक्षा याचना नहीं करनी चाहिए, यदि भिक्षा योग्य दूसरा घर नहीं मिले, तो पूर्व-पूर्व गृहों का त्याग करके भिक्षा याचना करनी चाहिये। इससे स्पष्ट होता है कि गुरुकुल गांवों के सन्निकट ही होते थे। स्वजातियों से भिक्षा याचना करने में उनके पक्षपात तथा ब्रह्मचारी के गृह की ओर आकर्षण का भय भी रहता था अतएव स्वजातियों से भिक्षा-याचना का पूर्ण निषेध कर दिया गया था। बहुधा राजा तथा सामन्तों का प्रोत्साहन पाकर विद्वान् पण्डित उनकी सभाओं की ओर आकर्षित होते थे और अधिकतर उनकी राजधानी में ही बस जाते थे, जिससे वे नगर शिक्षा के केन्द्र बन जाते थे। इनमें तक्षशिला, पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, मिथिला, धारा, तंजोर आदि प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार तीर्थ स्थानों की ओर भी विद्वान् आकृष्ट होते थे। फलत: काशी, कर्नाटक, नासिक आदि शिक्षा के प्रसिद्ध केन्द्र बन गये।

कभी-कभी राजा भी अनेक विद्वानों को आमंत्रित करके दान में भूमि आदि देकर तथा जीविका निश्चित करके उन्हें बसा लेते थे। उनके बसने से वहां एक नया गांव बन जाता था। इन गांवों को `अग्रहार’ कहते थे। इसके अतिरिक्त विभिन्न हिन्दू सम्प्रदायों एवं मठों के आचार्यों के प्रभाव से ईसा की दूसरी शताब्दी के लगभग मठ शिक्षा के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गये। इनमें शंकराचार्य, रामानुचार्य, मध्वाचार्य आदि के मठ प्रसिद्ध हैं। सार्वजनिक शिक्षण संस्थाएँ सर्वप्रथम बौद्ध विहारों में स्थापित हुई थीं। भगवान बुद्ध ने उपासकों की शिक्षा-दीक्षा पर अत्यधिक बल दिया। इस संस्थाओं में धार्मिक ग्रन्थों का अध्यापन एवं आध्यात्मिक अभ्यास कराया जाता था। अशोक (३०० ई। पू।) ने बौद्ध विहारों की विशेष उन्नति करायी। कुछ समय पश्चात् ये विद्या के महान केन्द्र बन गये। ये वस्तुत: गुरुकुलों के ही समान थे। किन्तु इनमें गुरु किसी एक कुल का प्रतिनिधि न होकर सारे विहार का ही प्रधान होता था। ये धर्म प्रचार की दृष्टि से जनसाधारण के लिए भी सुलभ थे। इनमें नालन्दा विश्वविद्यालय (४५० ई।), बलभी (७०० ई।), विक्रमशिला (८०० ई।) प्रमुख शिक्षण संस्थाएँ थीं।

नारियों के लिये पाठशालाएं

आलोच्य काल में नारियों के लिए किसी प्रकार की पाठशाला का पृथक्-प्रबन्ध किया गया हो ऐसा वर्णन प्राप्त नहीं होता। बौद्धों ने अपने विहारों में भिक्षुणियों की शिक्षा की व्यवस्था की थी किन्तु कालान्तर में उसके भी उदाहरण प्राप्त नहीं होते। वस्तुत: कन्याओं के लिए पृथक् पाठशालाएँ न थीं। जिन कन्याओं को गुरुकुल में अध्ययन करने का अवसर प्राप्त होता था वे पुरुषों के साथ ही अध्ययन करती थीं। उतररामचरित में बाल्मीकि के आश्रम में आत्रेयी अध्ययन कर रही थी। भवभूति ने `मालती माधव’ (प्रथमांक) में कामन्दकी के गुरुकुल में अध्ययन करने का वर्णन किया है। किन्तु ये उदाहरण बहुत कम हैं। अधिकतर गुरुपत्नी, गुरुकन्या अथवा गुरु की पुत्रवधू ही गुरुकुल में रहने के कारण अध्ययन का लाभ उठा पाती थीं वस्तुत: शास्त्रों के अनुरोध पर कन्याओं की शिक्षा गृह पर ही होती थी।

सह-शिक्षा एवं पृथक् शिक्षा विवेचन

उत्तररामचरित में बाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश के साथ पढ़ने वाली आत्रेयी नामक स्त्री का उल्लेख हुआ है। जो इस बात का पुष्ट प्रमाण है कि उस युग में सह-शिक्षा का प्रचार था। इसी प्रकार `मालती-माधव’ में भी भवभूति ने भूरिवसु एवं देवराट के साथ कामन्दकी नामक स्त्री के एक ही पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करने का वर्णन किया है। भवभूति आठवी शताब्दी के कवि हैं। अतएव ऐसा प्रतीत होता है कि यदि भवभूति के समय में नहीं तो उनसे कुछ समय पूर्व तक बालक-बालिकाओं की सह-शिक्षा का प्रचलन अवश्य रहा होगा। इसी प्रकार पुराणों में कहोद और सुजाता, रूहु और प्रमदवरा की कथाएं वर्णित हैं। इनसे ज्ञात होता है कि कन्याएं बालकों के साथ-साथ पाठशालाओं में पढ़ती थीं तथा उनका विवाह युवती हो जाने पर होता था। परिणामत: कभी-कभी गान्धर्व विवाह भी हो जाते थे। ये समस्त प्रमाण इस तथ्य पर प्रकाश डालते हैं कि उस युग में स्त्रियाँ बिना पर्दे के पुरुषों के बीच रह कर ज्ञान की प्राप्ति कर सकती थीं। उस युग में सहशिक्षा-प्रणाली का अस्तित्व भी इनसे सिद्ध होता है। गुरुकुलों में सहशिक्षा का प्रचार था, इस धारणा का समर्थन आश्वलायन गृह ससूत्र में वर् णित समावर्तन संस्कार की विधि से भी मिलता है। इस विधि में स्नातक के अनुलेपन क्रिया के वर्णन में बालक एवं बालिका का समार्वतन संस्कार साथ-साथ सम्पन्न होना पाया जाता है। उस युग में स्त्री के ब्रह्मचर्याश्रम, वेदाध्ययन तथा समावर्तन संस्कार का औचित्य आश्वलायन के मतानुसार प्रमाणित हो जाता है।