निर्भयता का रहस्य

vidyarthi vikas sansthan

nirbhayata ka rahasya

nirbhayata ka rahasya

“हाँ वह आता है, परंतु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता है क्योंकि वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता।”

स्वामी दयानंद का ब्रह्मचर्य बल बड़ा अदभुत था। वे शरीर से हृष्ट-पुष्ट, स्पष्टभाषी एवं निडर व्यक्तित्व के धनी थे। उनके संयम का ही प्रबल प्रभाव था कि विरोधियों ने उन्हें 22-22 बार जहर देने की कुचेष्टा की, किन्तु उनके शरीर ने उसे दूध-घी की तरह पचा दिया।

एक बार अलीगढ़ में वे एक मुसलमान के यहाँ ठहरे हुए थे। अपना भोजन स्वयं बनाकर खाते एवं शाम को ‘कुराने शरीफ’ पर प्रवचन करते। वे कहतेः “एक तरफ तो बोलते हो कि ‘ला इल्लाह इल्लिल्लाह… अल्लाह के सिवाय कोई नहीं है। सबमें अल्लाह है….’ और दूसरी तरफ बोलते हो कि हिन्दुओं को मारो काटो… वे काफिर हैं… ‘ये कैसे नालायकी के विचार हैं !’ क दिन गाँव के आगेवानों ने उनसे कहाः

“स्वामी जी ! आप एक मुसलमान के घर रहते हैं और मुसलमानों को खरी-खोटी सुनाते हैं। थोड़ा तो ख्याल करें !’

इस पर उन निर्भीक बाबा ने कहाः “जिनके यहाँ रहता हूँ उनको अगर सत्य सुनाकर उन की गलती नहीं निकालूँगा तो फिर और किसको सत्य सुनाऊँगा ?”

एक बार जोधपुर के महाराज जसवंत सिंह (द्वितीय) एक वेश्या के साथ सिंहासन पर बैठे हुए थे। वे उस वेश्या पर बड़े आसक्त थे। तभी संदेशवाहक ने राजा को सावधान किया कि संन्यासी दयानंद पधार रहे हैं। दयानंद जी का नाम सुनते ही जसवंत सिंह के हाथ-पाँव फूल गये। उन्होंने शीघ्र पालकी मँगवायी और वेश्या को जाने को कहा। जल्दबाजी में पालकी एक ओर झुक गयी। जसवंत सिंह ने आगे बढ़कर पालकी को सँभालने के लिए कंधा दे दिया। ठीक उसी समय ऋषि दयानंद जी वहाँ पधारे। महाराजा को वेश्या की पालकी को कंधा देते देखकर दयानंदजी ने सिंहगर्जना कीः “सिंहों के सिंहासनि पर कुतिया का राज ! इन कुतियों से कुत्ते ही पैदा होंगे।” सारा दरबार थर्रा उठा और दयानंद जी वहाँ से लौट गये। एक राजा वेश्या की गुलामी करे यह बात उन्हें बिल्कुल सहन न हुई और परिणामों की परवाह किये बिना, निर्भयतापूर्वक उन्होंने उसे धिक्कार भी दिया।

एक बार किसी ने स्वामी जी से पूछाः “आपको कामदेव सताता है या नहीं ?” इस पर उन्होंने उत्तर दियाः “हाँ वह आता है, परंतु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता है क्योंकि वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता।”

ऋषि दयानंद कार्य में इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें इधर-उधर की बातों के लिए फुर्सत ही नहीं थी। यही उनके ब्रह्मचर्य का रहस्य था।

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निर्भयता का रहस्य

Maharshi_Dayanand_Saraswati

“हाँ वह आता है, परंतु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता है क्योंकि वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता।”

स्वामी दयानंद का ब्रह्मचर्य बल बड़ा अदभुत था। वे शरीर से हृष्ट-पुष्ट, स्पष्टभाषी एवं निडर व्यक्तित्व के धनी थे। उनके संयम का ही प्रबल प्रभाव था कि विरोधियों ने उन्हें 22-22 बार जहर देने की कुचेष्टा की, किन्तु उनके शरीर ने उसे दूध-घी की तरह पचा दिया।

एक बार अलीगढ़ में वे एक मुसलमान के यहाँ ठहरे हुए थे। अपना भोजन स्वयं बनाकर खाते एवं शाम को ‘कुराने शरीफ’ पर प्रवचन करते। वे कहतेः “एक तरफ तो बोलते हो कि ‘ला इल्लाह इल्लिल्लाह… अल्लाह के सिवाय कोई नहीं है। सबमें अल्लाह है….’ और दूसरी तरफ बोलते हो कि हिन्दुओं को मारो काटो… वे काफिर हैं… ‘ये कैसे नालायकी के विचार हैं !’ क दिन गाँव के आगेवानों ने उनसे कहाः

“स्वामी जी ! आप एक मुसलमान के घर रहते हैं और मुसलमानों को खरी-खोटी सुनाते हैं। थोड़ा तो ख्याल करें !’

इस पर उन निर्भीक बाबा ने कहाः “जिनके यहाँ रहता हूँ उनको अगर सत्य सुनाकर उन की गलती नहीं निकालूँगा तो फिर और किसको सत्य सुनाऊँगा ?”

एक बार जोधपुर के महाराज जसवंत सिंह (द्वितीय) एक वेश्या के साथ सिंहासन पर बैठे हुए थे। वे उस वेश्या पर बड़े आसक्त थे। तभी संदेशवाहक ने राजा को सावधान किया कि संन्यासी दयानंद पधार रहे हैं। दयानंद जी का नाम सुनते ही जसवंत सिंह के हाथ-पाँव फूल गये। उन्होंने शीघ्र पालकी मँगवायी और वेश्या को जाने को कहा। जल्दबाजी में पालकी एक ओर झुक गयी। जसवंत सिंह ने आगे बढ़कर पालकी को सँभालने के लिए कंधा दे दिया। ठीक उसी समय ऋषि दयानंद जी वहाँ पधारे। महाराजा को वेश्या की पालकी को कंधा देते देखकर दयानंदजी ने सिंहगर्जना कीः “सिंहों के सिंहासनि पर कुतिया का राज ! इन कुतियों से कुत्ते ही पैदा होंगे।” सारा दरबार थर्रा उठा और दयानंद जी वहाँ से लौट गये। एक राजा वेश्या की गुलामी करे यह बात उन्हें बिल्कुल सहन न हुई और परिणामों की परवाह किये बिना, निर्भयतापूर्वक उन्होंने उसे धिक्कार भी दिया।

एक बार किसी ने स्वामी जी से पूछाः “आपको कामदेव सताता है या नहीं ?” इस पर उन्होंने उत्तर दियाः “हाँ वह आता है, परंतु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता है क्योंकि वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता।”

ऋषि दयानंद कार्य में इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें इधर-उधर की बातों के लिए फुर्सत ही नहीं थी। यही उनकेब्रह्मचर्य का रहस्य था।