विद्यार्थी के योग्यता को बढ़ाने के उपाय

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विद्यार्थीयों में  प्राणायाम, योगासन, यौगिक प्रयोगों व प्रेरणादायी प्रसंगों के द्वारा नैतिक, चारित्रिक, मानसिक व बौद्धिक उन्नति करनेवाले जीवनमुल्यों व दिव्य संस्कारों का सिंचन किया गया ।

विद्यार्थिओं के जीवन को उज्जवल बनाने में सहायक कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निचे दिए जा रहे है !

  1. सबसे विनयपूर्वक मीठी वाणी से बोलना |

  2. किसीकीचुगली या निंदा नहीं करना |

  3. किसीके सामने किसी भी दुसरे की कही हुई ऐसी बात को न कहना, जिससे सुननेवाले के मन में उसके प्रति द्वेष या दुर्भाव पैदा हो या बड़े |

  4. जिससे किसीके प्रति सदभाव तथा प्रेम बढ़े, द्वेष हो तो मिट जाये या घट जाये, ऐसी ही उसकी बात किसीके सामने कहना |

  5. किसीको ऐसी बात कभी न कहना जिससे उसका जी दुःखे |

  6. बिना कार्य ज़्यादा न बोलना, किसीके बीच में न बोलना, बिना पूछे अभिमानपूर्वक सलाह न देना, ताना न मरना, शाप न देना | अपनेको भी बुरा-भाला न कहना, गुस्से में आ कर अपनेको भी शाप न देना, न सिर पीटना |

  7. जहाँ तक हो परचर्चा न करना, जगचर्चा न करना | आए हुए का आदर-सत्कार करना, विनय-सम्मान के साथ हँसते हुए बोलना |

  8. किसीके दुःख के समय सहानुभूतिपूर्ण वाणी से बोलना | हँसना नहीं | किसीको कभी चिढ़ाना नहीं |अभिमानवश घरवालों को या कभी किसीकोमूर्ख, मंदबुद्धि, नीच वृत्तिवाला तथा अपने से नीचा न मानना, सच्चे हृदय से सबका सम्मान व हित करना | मन में अभिमान तथा दुर्भाव न रखना, वाणी से कभी कठोर तथा निंदनीय शब्दों का उच्चारण न करना | सदा मधुर विनाम्रतायुक्त वचन बोलना | मूर्ख को भी मूर्ख कहकर उसे दुःख न देना |

  9. किसीकाअहित हो ऐसी बात न सोचना, न कहना और न कभी करना | ऐसी ही बात सोचना, कहना और करना जिससे किसीका हित हो |

  10. धन, जन, विद्या, जाति, उम्र, रूप, स्वास्थ्य, बुद्धि आदि का कभी अभिमान न करना |

  11. भाव से, वाणी से, इशारे से भी कभी किसीका अपमान न करना, किसीकी खिल्ली न उड़ना |

  12. दिल्लगी न करना, मुँह से गन्दी तथा कड़वी जबान कभी न निकालना | आपस में द्वेष बढ़े, ऐसी सलाह कभी किसीको भी न देना | द्वेष की आग में आहुति न देकर प्रेम बढे ऐसा अमृत ही सींचना |

  13. फैशन के वश में न होना | कपडे साफ-सुथरे पहनना परन्तु फैशन के लिए नहीं |

  14. घर की चीजों को संभालकर रखना | इधर-उधर न फेंकना | घर की चीजों की गिनती रखना |अपना काम जहाँ तक हो सके स्वयं ही करना |अपना काम आप करने में तो कभी लज्जाना ही, बल्कि जो काम नौकरों से या दूसरों से कराये बिना अपने करने से हो सकता है उस काम को स्वयं ही करना | काम करने में उत्साही रहना | काम करने की आदत न छोड़ना |

  15. किसी का कभी अपमान न करना | तिरस्कारयुक्त बोली न बोलना |

 

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